व्यापारी उमेश केसरवानी और उनके पिता रामचंद्र को नौ साल के भीतर दूसरा भारी आघात पहुंचा है। उमेश के छोटे भाई नरेश की बीमारी से मौत के गम से परिवार के लोग अभी उबरे भी नहीं थे कि इस अग्निकांड ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। उन्हें ऐसा सदमा मिला है जो जिंदगी भर उन्हें टीस देता रहा है।
रामचंद्र केसरवानी के दो बेटों में बड़े उमेश केसरवानी अपने छोटे भाई नरेश के साथ कपड़े का कारोबार कर रहे थे तभी 2007 में बीमारी ने नरेश की जान ले ली। नरेश की पत्नी वंदना बेटियों वैशाली तथा चेतना और बेटे गगन के साथ जेठ उमेश के भरोसे हो गईं। उमेश ने भी उनका पूरा साथ दिया। बच्चों की अच्छे स्कूल में पढ़ाई कराई गई। मौजूदा समय में वंदना की एक बेटी वैशाली दिल्ली में पढ़ाई कर रही है। सुबह घटना के वक्त बेटा गगन स्कूल गया था। वंदना बेटी चेतना के साथ कमरे में थी। दूसरे कमरे में उनकी जेठानी स्नेहलता बेटी पारूल और बेटे विशाल के साथ थीं। आग फैली और धुआं ऊपर कमरों में आने लगा तो उमेश ने आकर उन सभी को छत पर जाकर बगल में चचेरे भाई अनूप के मकान की छत पर जाने को कहा। फिर उमेश नीचे आकर दुकान और गोदाम में आग बुझाने में जुट गए थे।
छत पर जाने के बाद स्नेहलता और पारूल को बुजुर्ग रुक्मणि का ख्याल आया तो वे उन्हें बचाने लिए नीचे उतर आई। मगर वे भी जान गंवा बैठीं। परिजनों ने बताया कि 70 वर्षीय रुक्मणि को सांस की बीमारी थी। वे तो अगरबत्ती का भी धुआं नहीं बर्दाश्त कर पाती थीं। ऐसे में कपड़े जलने से निकला विषैला धुआं तो उनके लिए जानलेवा ही था। अग्निकांड में झुलसे उमेश मां, पत्नी, बेटी के गम में रोते रहे। उन्हें लोग किसी तरह दिलासा देते रहे। उनकी भयाहू वंदना का दुख और भी गहरा है। पति नरेश को खो चुकी वंदना अब सास, जेठानी और भतीजी की मौत के गम में लगातार आंसू बहाती रहीं। खबर पाकर उनके मायके वाले भी आ गए थे।
सुलेेमसराय में कपड़ा कारोबारी उमेश केसरवानी की दुकान और मकान में आग लगने पर स्थानीय लोग मदद और राहत कार्य में टूट पड़े। कुछ लोग तो सीधे शटर के रास्ते घुसने की कोशिश में लपटों की चपेट में आ गए। दमकल के आने पर देरी हुई तो मुहल्ले वाले और कारोबारी के तमाम परिचित बाहर से सीढ़ी लगाकर दूसरे तल पर पहुंचे। हालांकि वहां घने धुएं की वजह से लोगों का दम घुटने लगा। मगर वे जान जोखिम में डालकर आग बुझाने और माल निकालने में लगे रहे। उमेश और उनके बेटे विशाल के अलावा बगल के मकान में रहने वाले चचेरे भाई अनूप केसरवानी, अमित केसरवानी उर्फ काले समेत रिश्तेदार के अलावा अनिल चौरसिया उर्फ मुन्नन, नंदकिशोर, सुशील चौरसिया, बबलू केसरवानी, राहुल केसरवानी, मल्लू यादव, राहुल कुशवाहा, ओमजी, गोलू केसरवानी, सनोज केसरवानी, सुभाष अरोड़ा, एसके टेलर, नंदू उर्फ मयूर पासी, जवाहरलाल केसरवानी समेत स्थानीय लोगों ने राहत कार्य में भरसक प्रयास किया। आग बुझाने की कोशिश में अग्निशमन अधिकारी लालजी गुप्ता, फायरमैन धमेंद्र मिश्रा, रमेश कुमार भी जख्मी हो गए। लालजी गुप्ता के पैर का अंगूठा कट गया।
कपड़ा कारोबारी उमेश केसरवानी की अग्निकांड में मृत मां रुक्मणि केसरवानी, पत्नी स्नेहलता और बेटी पारूल के शवों को पोस्टमार्टम के बाद शाम को घर पर ले जाया गया तो फिर जाम लग गया। वहां जुटी रिश्तेदार महिलाओं के विलाप ने हर किसी को दहला दिया। कुछ देर बाद वहां से तीनंों शवों को रसूलाबाद गंगा घाट ले जाया गया। अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, कारोबारी तथा कई दलों के नेता भी शामिल हुए। स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह भी रसूलाबाद घाट पर पहुंचे और गम में डूबे उमेश केसरवानी को सांत्वना दी। उमेश ने ही मां, पत्नी, बेटी की चिताओं को मुखाग्नि दी।
महाकुंभ के दौरान करीब आठ करोड़ कीमत की हाइड्रोलिक गाड़ी इलाहाबाद फायरब्रिगेड को मुहैया कराई गई लेकिन यह गाड़ी शोपीस ही बनी है। पिछले तीन साल के दौरान बहुमंजिला इमारतों में आग लगने की कई घटनाएं हुई लेकिन इस गाड़ी का इस्ेतमाल नहीं किया जा रहा है। सोमवार को सुलेमसराय में तीन मंजिला मकान में आग लगने की घटना में भी इसे मौके पर नहीं ले जाया गया वरना शायद तीन लोगों की जान बचाने में कामयाबी मिल जाती। सूत्रों ने बताया कि सिविल लाइंस फायर ब्रिगेड के स्टोर में आक्सीजन मास्क, विशेष सूट समेत कई अन्य साजोसामान हैं लेकिन उन्हें कभी मौके पर ले ही नहीं जाता जाता है।