फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

फिल्मी पटकथा जैसा था सीबीआई कोर्ट का फैसला

Sat, 14 Oct 2017 02:01 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
demo pic
विज्ञापन
आरुषि-हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को उम्रकैद की सजा सुनाने वाले विशेष न्यायाधीश के फैसले को हाईकोर्ट ने फिल्मी पटकथा जैसा करार दिया है। जिसमें ट्रायल जज ने अपने तरीके से गलत अनुमानों से भरे तथ्यों पर एक कहानी खड़ी कर ली। खुद की भावनाओं के अनुरूप तथ्यों और साक्ष्यों का परीक्षण किया। पूरे घटनाक्रम पर स्वयं की कल्पित परिस्थितियों का दायरा बना लिया और उसी नजरिए से फैसला सुना दिया। इस बात की परवाह किए बिना कि पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से भरा है। ट्रायल जज ने परिस्थितियों को गणित की पहेली की तरह हल किया। सीबीआई कोर्ट के फैसले को पलटने वाले निर्णय में शामिल खंडपीठ के एक जज न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्र प्रथम ने अपने अलग से लिखाए दो पेज के निर्णय में सीबीआई जज के निर्णय देने के तरीके पर तीखी टिप्पणी की है।
विज्ञापन


जस्टिस मिश्र ने कहा है कि ट्रायल कोर्ट को गणित के उस अध्यापक की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए जो किसी सवाल को हल करते समय समानता लाने के लिए उसमें कुछ जोड़ता है। जबकि हर आपराधिक विचारण में तथ्यों की तुलना साक्ष्यों, परिस्थितियों और रिकार्ड पर उपलब्ध तथ्यों के दायरे में की जाती है। ट्रायल जज ने किसी एनीमेटेड फिल्म की तरह पूरी कहानी की कल्पना कर ली और जलवायु विहार के फ्लैट एल 32 के भीतर और बाहर उस रात क्या हुआ होगा उसे अपनी कल्पनाओं का रंग दे दिया। उन्होंने किसी फिल्म डायरेक्टर की तरह पूरी पटकथा की कल्पना कर ली और उसमें उपलब्ध तथ्यों से उसकी समानता कर दी।

हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज को कानून के मूल तत्वों और उसके उपयोग की जानकारी नहीं है। वह केस के तथ्यों, परिस्थितियों और साक्ष्यों का मूल्यांकन करने में असफल रहे। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ट्रायल जज ने अति उत्साह, भावनाओं और स्वयं की धारणाओं के वशीभूत होकर सजा का फैसला सुनाया है। जबकि उनको उपलब्ध साक्ष्यों को तथ्यों की कसौटी पर परखना चाहिए था। उनको सभी चीजों को एक नजरिए से परखना चाहिए था भले ही गवाहों के बयान और जांच अधिकारी का निष्कर्ष भिन्न हो। जज को अनावश्यक रूप से समानता नहीं खोजनी चाहिए थी। इस फैसले में यही उनकी गलती है। ट्रायल जज से सही और निष्पक्ष होने की अपेक्षा की जाती है। फैसले में परिस्थितियों को अपनी भावनाओं के अनुसार देखने के बजाए उसकी मूल स्थिति के अनुसार देखा जाना चाहिए।
विज्ञापन
विज्ञापन


निचली अदालतों को दी गाइड लाइन
1- केस साक्ष्यों और तथ्यों को संकीर्ण नजरिए से देखने से बचना चाहिए
2- साक्ष्यों की समीक्षा करते समय भावनात्मक नजरिया न अपनाया जाए
3- साक्ष्यों और तथ्यों की तुलना करते समय स्वयं की धारणा उस पर हावी न हो
4- स्वयं के सृजित तथ्यों पर निर्णय आधारित नहीं होना चाहिए
5- कल्पनाओं को ठोस आधार न दिया जाए और पारदर्शिता नजर आनी चाहिए
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें