इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जमानत से जुड़े मामलों में अदालतें, पूर्व के आदेशों की समीक्षा नहीं कर सकती हैं। ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने भी हरी सिंह मान के मामले में कहा है। हाईकोर्ट ने उक्त टिप्पणी के साथ ही प्रयागराज के कोतवाली थाने में दुष्कर्म सहित पॉक्सो, आईटी एक्ट में दर्ज आपराधिक मुकदमे में दाखिल द्वितीय जमानत अर्जी पर राहत देने से इन्कार कर दिया।
न्यायमूर्ति डॉ.गौतम चौधरी की पीठ ने योगेंद्र कुमार मिश्रा की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि याची ने इस न्यायालय की ओर से पहली जमानत अर्जी खारिज किए जाने के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत के समक्ष चुनौती न देकर दूसरी जमानत अर्जी दाखिल की।
दूसरी अर्जी में जमानत मांगने के लिए यह आधार बनाया गया कि पहली जमानत अर्जी में उन तर्कों को दर्ज नहीं किया गया, लिहाजा जमानत अर्जी खारिज कर दी गई। इसलिए याची प्रथम जमानत अर्जी में प्रस्तुत किए गए आधारों पर ही जमानत पाने का हकदार है।
कोर्ट ने कहा कि दूसरी जमानत अर्जी पर सुनवाई कर रही पीठ इस मामले पर यह गौर नहीं कर सकती कि पहले जमानत आवेदन पर निर्णय लेते समय तत्समय प्रस्तुत तथ्य दर्ज किए गए हैं या नहीं। दूसरी बात यह कि यदि यह न्यायालय इसकी जांच करता है, तो पहले के आदेश की समीक्षा करना होगा, जो कि आपराधिक कानून के तहत स्वीकार्य नहीं है।
इसके पूर्व याची के अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि याची को इस प्रकरण में झूठा फंसाया गया है। उसने कथित अपराध कारित नहीं किया है। प्रथम सूचना रिपोर्ट काफी विलंब से दर्ज कराई गई है, जिसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है, जबकि वादिनी के घर से थाने की दूरी मात्र दो किमी है।
मेडिकल रिपोर्ट में पीड़ित की उम्र 19 वर्ष पाई गई है। हालांकि, अपर शासकीय अधिवक्ता ने इसका विरोध किया। कहा, प्रथम जमानत अर्जी के आदेश में भले ही याची के अधिवक्ता की ओर से प्रस्तुत किए गए तर्कों को उद्धृत न किया गया हो, किंतु यह माना जाएगा कि उन्होंने उन सभी तर्कों को सुनने के बाद ही जमानत निरस्त की है। ऐसी स्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज कर दी।