इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चकबंदी से जुड़े मामले को एक से दूसरे जिले में स्थानांतरित करने की मांग पर तल्ख टिप्पणी करते हुए याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर तारीख पर तारीख की बात कहकर अदालतों की आलोचना की जाती है। दूसरी ओर मामले में शीघ्र सुनवाई से बचने के लिए हाईकोर्ट से गुहार लगाई जा रही है।
मामला औरैया जिले के अर्वा तहसील का है। याची मनोरमा तिवारी और विपक्षी के बीच चकबंदी अधिकारी की अदालत में मुकदमा लंबित है। विपक्षी की गुजारिश पर अदालत मामले का शीघ्र निस्तारण करने के लिए जल्दी-जल्दी तारीखें नियत कर रही है। इसके खिलाफ याची ने पहले अपर आयुक्त की अदालत से मामले को अन्य जिले में स्थानांतरित करने की मांग की, जो खारिज कर दी गई। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि चकबंदी अधिकारी दाखिल साक्ष्यों की अनदेखी कर विपक्षी के अनुचित दबाव में जल्दी-जल्दी तारीख नियत कर रहे हैं। तर्क दिया कि चकबंदी अधिकारी ने अपने आदेश में भी इस तथ्य का उल्लेख किया है कि वह विपक्षी के दबाव में काम कर रहे हैं।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर की कोर्ट ने याची की ओर से पेश आदेश पत्रक का अवलोकन करने के बाद पाया कि अदालत ने ऑर्डर शीट में यह लिखा कि त्वरित निस्तारण के लिए दबाव बनाया जा रहा है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि वाक्यांश का यह मतलब निकालना की अदालत विपक्षी के दबाव में है, गलत है। चकबंदी अधिकारी की अदालत ने मामले के शीघ्र निस्तारण के लिए जल्दी-जल्दी तारीख नियत करने का फैसला लिया है, जो बिल्कुल सही है।