इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के ट्रायल कोर्ट किसी को बतौर आरोपी तलब नहीं कर सकता। समन आदेश जारी करने से पहले कोर्ट को लापरवाह रवैया अपनाने के बजाय ठोस सबूतों और गवाहों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आधार के ट्रायल कोर्ट किसी को बतौर आरोपी तलब नहीं कर सकता। समन आदेश जारी करने से पहले कोर्ट को लापरवाह रवैया अपनाने के बजाय ठोस सबूतों और गवाहों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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इसी तल्ख टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चवन प्रकाश की एकल पीठ ने मुरादाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट की ओर से याची संतोष वर्मा व मनीष वर्मा के खिलाफ मारपीट के आरोप में जारी समन आदेश रद्द कर दिया। साथ ही ट्रायल कोर्ट को दो माह में नए सिरे से विचार कर यह तय करने का आदेश दिया है कि क्या मामला वास्तव में मारपीट का है या फिर पैसों के लेनदेन एवं विश्वासघात से जुड़ा सिविल विवाद।
वैवाहिक विवाद से उपजा मामला
याची की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि मनीष की शादी वर्ष 2023 में हुई थी। बाद में पति-पत्नी के बीच विवाद बढ़ गया और वैवाहिक मुकदमेबाजी शुरू हुई। समझौते के तहत मनीष ने 15 लाख रुपये के तीन डिमांड ड्रॉफ्ट पत्नी और ससुर को सौंपे। आरोप है कि एक ड्रॉफ्ट नकद होने के बाद पत्नी ने समझौते की शर्तों के विपरीत तलाक की अर्जी देने से इन्कार कर दिया और अतिरिक्त पांच लाख रुपये की मांग की। इसके बाद याची ने शेष दो ड्रॉफ्ट के भुगतान पर रोक लगवा दी। इससे नाराज ससुर ने मारपीट का झूठा परिवाद दाखिल कर दिया।
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शिकायत में घटनाक्रम का अभाव
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि परिवाद में बेटी के साथ मारपीट का आरोप तो लगाया गया पर घटना की तारीख व समय का उल्लेख नहीं किया गया। न ही कथित पीड़िता की गवाही कराई गई। इसके बावजूद मजिस्ट्रेट की अदालत ने पति को आरोपी के रूप में तलब करने का आदेश पारित कर दिया।