इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अंतर्निहित शक्तियों से अदालत खुद के फैसले नहीं बदल सकती। वह भी तब जब फैसले पर जजों के हस्ताक्षर हो चुके हों। कोर्ट की यह शक्ति न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए है न कि खुद के फैसले पर पुनर्विचार के लिए।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति विवेक बिरला, न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की खंडपीठ ने इटावा निवासी लक्ष्मण की ओर दाखिल समीक्षा और देरी माफी की अर्जी खारिज करते हुए की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जजों के हस्ताक्षर होने के बाद गुणदोष के आधार पर पारित फैसले में केवल तथ्यात्मक और लिपिकीय त्रुटियों को ही सुधारा जा सकता है।
याची की अपील खारिज कर कोर्ट ने 42 साल पुराने आपराधिक मामले में दोषी करार दिया था। याची ने इसके खिलाफ अर्जी दाखिल कर फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि फैसला उनकी अनुपस्थिति में पारित किया गया। याची के पुराने अधिवक्ता का निधन हो चुका है। इससे उन्हें आदेश की जानकारी नहीं हो सकी। क्योंकि, याची वर्तमान में पंजाब में रहता है। लिहाजा, कोर्ट सुनवाई का अवसर देते हुए फैसले पर पुनर्विचार करे।