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जी हुजूरी नहीं, बच्चों की सही परवरिश कीजिए जनाब

Sat, 16 Apr 2016 02:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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‘बेटा ऐसा मत कीजिए’, ‘अरे, आप ये क्या कर रहे हैं’, ‘अच्छा बेटा आपको जो भी चाहिए मिल जाएगा, परेशान मत हो’। ‘अरे, आपने इसे तोड़ दिया, कोई बात नहीं, नया आ जाएगा’। बच्चों के साथ अभिभावकों के व्यवहार का आजकल ऐसा ही नजरिया आम हो चला है। रिश्तों में फॉर्मल व्यवहार घरों में रिश्तों पर हावी होता जा रहा है। अभिभावक बच्चों से जरूरत से ज्यादा तहजीब से पेश आ रहे हैं और बच्चे जिद्दी और डॉमिनेटिंग बनते जा रहे हैं। रिश्तों में बनावटीपन और दिखावापन हावी होता जा रहा है। कई वर्षों पहले तक बच्चों को मां बाप भले ही कितना डांट लेते या पिटाई भी कर देते थे लेकिन बच्चों के मन में उनके प्रति सम्मान कम नहीं होता था, लेकिन आज स्थितियां बदल रही हैं। अभिभावकों और बच्चों के बीच औपचारिकतापूर्ण व्यवहार बढ़ता जा रहा है।
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मनोवैज्ञानिक मालविका राव कहती हैं कि बीते कई वर्षों में एकल परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है। मां-बाप दोनों ही कामकाजी हैं। ऐसे में बच्चों के साथ वक्त बिताने के लिए उन्हें जो भी वक्त मिलता है, उसमें वे अपना सारा प्यार उड़ेल देना चाहते हैं। फिर चाहे बच्चों की हर जिद पूरी करने की बात हो या फिर बातचीत करने का अंदाज। अभिभावकों के दिमाग में यह भी चलता रहा है कि अगर हमने बच्चों की बात नहीं मानी तो बच्चे कहीं कोई गलत कदम न उठा लें। ऐसे में वह बच्चों पर जरूरत से ज्यादा प्रेम दिखाने की कोशिश करते हैं लेकिन यह पैरेंटिंग का गलत तरीका है। बच्चों की परवरिश में प्यार और डांट का एक संतुलन होना चाहिए।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ.आशीष सक्सेना कहते हैं, एकल परिवार होने की वजह से अब बच्चों को बाबा-दादी, चाचा-चाची और चचेरे भाई बहनों से मिलने वाला प्यार, दुलार के साथ ही सलाह भी नहीं मिल पा रही है। ऐसे में अभिभावक ही बच्चों पर जरूरत से ज्यादा लाड प्यार उडेल देना चाहते हैं। इससे बच्चों के मन में ऐसी भावना उपजने लगी है कि हम कुछ भी करेंगे, कुछ भी चाहेंगे वह हमें मिल जाएगा। इन स्थितियों में बच्चे डॉमिनेटिंग बन रहे हैं। उन्हें स्थितियों से सामंजस्य बिठाने की कला भी सिखानी होगी।
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इन बातों का रखें ख्याल
अभिभावक डांट और प्यार का संतुलन बनाकर रखें
सही बात पर बच्चों की तारीफ करें तो गलत पर डांटें भी
बच्चों की हर जिद पूरी करके उन्हें जिद्दी न बनाएं
शब्दों की औपचारिकता के बजाए भावनात्मक रूप से जुड़ें
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