ऑक्सफोर्ड से कानून की पढ़ाई करने वाली दुनिया की पहली महिला
नासिक में जन्मीं कॉर्नेलिया ऑक्सफोर्ड से कानून की पढ़ाई करने वाली दुनिया की पहली महिला थीं। भारत की पहली लॉ ग्रेजुएट थीं, लेकिन उनका पेशेवर जीवन संघर्षों की तपती दोपहरी रहा। बॉम्बे हाईकोर्ट ने जब महिला होने का हवाला देकर वकालत के लिए उनका आवेदन निरस्त कर दिया तो 1899 में इलाहाबाद हाईकोर्ट आईं। यहां प्लीडर की परीक्षा पास की, जिसके बाद वह भारत के किसी भी कोर्ट में वकील के रूप में पैरवी कर सकती थीं। इसके बाद भी उनका नामांकन नहीं किया गया।
महिला होने के कारण ठुकराई गईं
कलकत्ता हाईकोर्ट में भेदभाव की शिकार हुईं, तल्ख टिप्पणियां सुनीं। मुख्य लाइब्रेरी में वह नहीं जा सकती थीं, अलग जगह दी गई। पढ़ने के लिए कुछ ही किताबें दी जाती थीं। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी, लड़ती ही रहीं। अंतत: अगस्त 1921 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ससम्मान बतौर वकील उनका पंजीकरण किया। अधिवक्ता रूपाली गुप्ता ने अपने लेख (कॉर्नेलिया सोराबजी : इंडियाज फर्स्ट लेडी एडवोकेट) में इसका उल्लेख किया है।
'जानती नहीं हो तुम किसके सामने खड़ी हो'
वर्ष 1904 में ब्रिटिश शासन ने कॉर्नेलिया को बंगाल, बिहार, उड़ीसा (अब ओडिशा) और असम में कोर्टस ऑफ वार्ड्स की लीगल एडवाइजर नियुक्त किया, जिसका काम महिलाओं और अनाथों को कानूनी सहायता देना था। रियासतों से संबंधी अदालतों में जब पैरवी करने का मौका मिला तो भी उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की गई। एक बार एक नामचीन भारतीय वकील ने उनसे कहा कि तुम जानती भी हो कि किसके सामने खड़ी हो...।