इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 साल पुराने अपहरण के आरोप में दी गई सात साल की सजा रद्द कर दी। कहा कि केवल संदेह या शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकल पीठ ने विनोद की ओर से दायर याचिका पर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 43 साल पुराने अपहरण के आरोप में दी गई सात साल की सजा रद्द कर दी। कहा कि केवल संदेह या शक के आधार पर किसी भी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार (दशम) की एकल पीठ ने विनोद की ओर से दायर याचिका पर दिया।
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आरोपी के खिलाफ 1983 में इटावा के बरहपुरा थाने में हत्या के आरोप में मुकदमा दर्ज किया गया था। इटावा के सत्र न्यायालय ने सात साल की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी के खिलाफ केवल हत्या का ही आरोप तय किया गया था। उसी आरोप में उसे सत्र अदालत ने बरी कर दिया तो बिना आरोप तय किए अपहरण के अपराध में सजा देना कानूनन गलत है। दोनों अपराध अलग-अलग प्रकृति के हैं। इन्हें एक-दूसरे के स्थान पर नहीं माना जा सकता।