इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस दस्तावेज के जमीन को शत्रु संपत्ति बताकर निर्माण कार्य नहीं रोका जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने राज्य सरकार के अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण कब्जे और संपत्ति के उपयोग में हस्तक्षेप करने से रोक दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक सरन, न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की खंडपीठ ने मुजफ्फरनगर निवासी प्रेम गोयल व तीन अन्य की याचिका पर दिया।
मामला सिविल लाइंस साउथ स्थित प्लॉट संख्या-25 (पुराना नंबर-19) से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि करीब 90 वर्ग मीटर जमीन 12 जून 2018 को एक पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिये खरीदी थी। विकास प्राधिकरण से 16 अगस्त 2018 को निर्माण का नक्शा स्वीकृत कराया था। संपत्ति को शत्रु संपत्ति बताए जाने की शिकायतों पर जांच में भी जमीन शत्रु संपत्ति नहीं पाई गई। इसके बावजूद जनवरी 2023 में राज्य के अधिकारियों ने निर्माण रुकवा दिया। रात में निर्माण का कुछ हिस्सा गिराकर संपत्ति पर ‘यह शत्रु संपत्ति है’ लिख दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट ने इस तथ्य पर गौर किया कि शत्रु संपत्ति के अभिरक्षक की ओर से स्पष्ट रूप से कहा गया था कि विवादित संपत्ति शत्रु संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं है। साथ ही यह भी पाया कि राज्य सरकार शत्रु संपत्ति होने के दावे के समर्थन में ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी, जिससे साबित हो कि संपत्ति कभी शत्रु संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप या दावे के आधार पर संपत्ति को शत्रु संपत्ति बताकर निर्माण रोकने की कार्रवाई को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को 90 वर्ग मीटर संपत्ति के उस हिस्से में हस्तक्षेप करने से रोक दिया है, जिसका नक्शा स्वीकृत है। इसके साथ ही याचिका स्वीकार कर ली।