सदियों से मोक्ष और मंगल की महिमा वाले संगम तट पर शुक्रवार को पूरी दुनिया का एक साथ समागम कुंभ के लिए इतिहास बन गया। पहली बार विश्व के 187 देशों की संस्कृतियों, मतों, परंपराओं विचारों के लोग एक साथ प्रेम-शांति के प्रतीक संगम पर डुबकी लगाकर धन्य हुए। कुछ ने डुबकी लगाई तो कुछ ने आचमन किया। मंत्रोच्चार के साथ पूजा, ध्यान भी। खुशी और उत्साह केबीच भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को कुछ देर जीने और आत्मसात करने का दृश्य ऐसा ही था।
विदेशी अतिथियों का पहला दल दोपहर 1:15 बजे संगम पहुंचा। गले में माला, हाथों में फूल लिए विदेशी मेहमान आगे बढ़े। ढोलक, हारमोनियम पर भजनों के जरिए गंगा की महिमा का गान हो रहा था। अतिथि संगीतमय भजनों की धुन पर मुग्ध हो रहे थे। इसके बाद डुबकी लगने लगी। जमैका से आईं रेडियो कलाकार रॉक्सीन पहली बार संगम तट पहुंची थीं। उनका कहना था कि कुंभ और संगम के बारे में जितना सुना था उससे अधिक यहां आया देखने को मिला। ऐसी खूबसूरती उन्होंने पहली बार देखी। चिकित्सा पेशे से जुड़ीं डेनमार्क की कैथोविड विच ने भी संगम में डुबकी लगाई।
उनका कहना था कि इस जल के स्पर्श से उन्हें गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति हुई। मौका मिला तो वह फिर संगम में लगाना चाहेंगी। उन्होंने कहा कि सचमुच कुंभ दिव्यता और भव्यता से भरा है। इससे पहले विदेशी मेहमान फूलों से सुसज्जित क्रूज पर सवार होकर किला घाट पहुंचे। अक्षयवट गेट के पास पुलिस बैंड पर देश भक्ति की धुनों से उनका स्वागत किया गया। इसके बाद विदेशी अतिथियों ने सदियों पुरानी आध्यात्मिक धरोहर के रूप में अक्षयवट का दर्शन किया। अक्षयवट की आध्यात्मिक महिमा के बारे में पर्यटन विभाग के गाइड विदेशी मेहमानों को जानकारी दे रहे थे। इसके बाद सरस्वती कूप होते हुएविदेशी अतिथि बड़े हनुमान के दरबार भी पहुंचे।वहां भी कई विदेशी मेहमानों ने पूजा-आरती की।