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Prayagraj : चित्रकारों की क्रांतिकारी विरासत से जीवंत हो रहा कंपनी बाग, स्वदेशी कला को किया पुनर्जीवित

Sat, 20 Sep 2025 06:33 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक संघर्षों का भी दौर था। उस दौर में कला के क्षेत्र में स्वदेशी को पुनर्जीवित करने के लिए चित्रकारों के योगदान को इन दिनों कंपनी बाग स्थित संग्रहालय के एके कुमारास्वामी हॉल में सजाया गया है।
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चित्रकला प्रदर्शनी में हिस्सा लेते बच्चे। - फोटो : अमर उजाला।
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स्वतंत्रता आंदोलन सिर्फ राजनीतिक ही नहीं, सांस्कृतिक और सामाजिक संघर्षों का भी दौर था। उस दौर में कला के क्षेत्र में स्वदेशी को पुनर्जीवित करने के लिए चित्रकारों के योगदान को इन दिनों कंपनी बाग स्थित संग्रहालय के एके कुमारास्वामी हॉल में सजाया गया है। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट की कलाकृतियां दीवारों में रंग भर रही हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दृश्य कला विभाग में प्रो. अजय जेतली बताते हैं कि अंग्रेज व्यापारी के रूप में भारत आए थे। उन्होंने अपनी कला का भी व्यापार में इस्तेमाल किया। यहां के कलाकारों से यूरोप में प्रचलित कला शैली की कृतियां तैयार करवाईं। इसके खिलाफ कोलकाता के शांति निकेतन का बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट अवनींद्र नाथ टैगोर के नेतृत्व में खड़ा हुआ। भारतीय लोक संस्कृति को चित्रों में उकेरा जाने लगा। कला आंदोलन के अगुवा रहे गगनेंद्रनाथ की पुरी के मंदिर की पेंटिंग प्रदर्शनी में भारतीय जनमानस के आस्था अगुवाई कर रही है। आशित हलदर, नंदलाल बोस, प्रोमेश रॉय, देबोशीष बनर्जी, सुधीर रंजन खास्तगीर जैसे प्रमुख चित्रकारों की रचनाएं दीवारों की शोभा बढ़ा रही हैं।

 

 

जगाई-मधाई का हृदय परिवर्तन...प्रयागराज के शैलेंद्रनाथ डे की कृति

 

 

कला सेनानियों में शुमार चित्रकार शैलेंद्रनाथ डे प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के ही रहने वाले थे। साम्राज्यवादी दौर में जब कला आंदोलन शुरू हुआ तो चित्रकार पूरे भारत

में स्वदेशी कला के प्रचार में लग गए। ऐसे में बाद के दिनों में शैलेंद्रनाथ ने राजस्थान को भी अपना ठिकाना बनाया। जगाई-मधाई नाम की उनकी प्रमुख पेंटिंग लगाई गई है। जो पाप कर्म से सत्कर्म की कहानी बयां करती है।

दार्शनिक होते हैं भारतीय चित्रकार

 

भारतीय चित्रकला की रचना प्रक्रिया में पहले अपने अंदर देखना होता है फिर रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। इन अर्थों में भारतीय चित्रकार दार्शनिक होता है। ब्रिटिश चित्रकारी बाहर की सुंदरता पर आधारित है। जो देखा उसे व्यक्त किया। - प्रो. अजय जेतली, अध्यक्ष, दृश्य कला विभाग, इविवि

 

जन-जन तक संस्कृति पहुंचाने का उद्देश्य

अमूमन प्रदर्शनी एक दिन से हफ्ताभर तक चलती है। इसे अगस्त मध्य से अक्तूबर की शुरुआत तक चलाने का उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोग हमारी सांस्कृतिक विरासत को समझ सकें। युवाओं को इससे जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। - राजेश प्रसाद, निदेशक इलाहाबाद संग्रहालय

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