मूल जड़ की तीन शाखाओं में विष्णु, ब्रह्मा, महेश, सिर्फ प्रयाग में भगवान विष्णु के दो चरण कमल तीर्थराज प्रयागराज के संगम क्षेत्र में अद्भुत, अद्वितीय, आलौकिक अक्षयवट भी है, जिसके दर्शन मात्र से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि सृष्टि के प्रलय के समय भगवान विष्णु ने अक्षयवट पर आसन लगाकर पुन: नई सृष्टि की रचना की थी। इसके आधार में स्वयं भगवान विष्णु का वास है। प्रयाग महात्म्य के अध्याय 72 के अनुसार, ‘प्रयागं वैष्णवं क्षेत्रं बैकुंठाधिकं मम, वृक्षोक्षयवटस्त्रत्र मदाधारो विराजते’ अर्थात प्रयाग मेरा क्षेत्र है,वह मेरे लिए बैकुंठ से भी अधिक प्रिय है क्योंकि वहीं अक्षयवट है, जिसके आधार में मैं विराजता हूं। वस्तुत: अक्षयवट को ब्रह्मांड का स्वरूप माना गया है, ऐसे में इसकी परिक्रमा से संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा का फल मिलता है।