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प्रयागराज के बीस फीसदी बच्चे कमजोर, अज्ञानता सेहत की जंग पर भारी

अविनाशी श्रीवास्तव, प्रयागराज Published by: अनिल पांडेय Updated Sat, 02 Jan 2021 06:14 PM IST

सार

कुपोषण के खिलाफ तमाम अभियानों पर अशिक्षा और अव्यवस्था हावी है। जिले के 90 हजार से अधिक बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इन बच्चों पर उम्मीदों का बोझ डालना तो दूर खुद इनका जीवन इतना भारी है कि कुछ कदम में ही सांसें फूलने लगती हैं। कुपोषण को लेकर प्रयागराज के आंकड़े चिंता पैदा करने वाले हैं। जिले में 13,566 गंभीर कुपोषित बच्चे हैं। वहीं कुल कुपोषित बच्चों की संख्या 90,575 है। यह संख्या कुल बच्चों की आबादी का 20 फीसदी से भी अधिक है। गौर करने वाली बात यह है कि आदिवासी और अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं शहर के आंकड़े भी चौंकाने वाले हैं। शहरी क्षेत्र में 23 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। कुपोषण से मुक्ति के लिए जिले में करीब दो दर्जन योजनाएं संचालित हैं। इसके बावजूद यह स्थिति है।
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अंजलि - फोटो : अमर उजाला

कुपोषण और इसके खिलाफ लड़ाई में प्रशासनिक दावों की सच्चाई जानने के लिए अमर उजाला ने गांवों में जाकर पड़ताल की तो निराशाजनक स्थिति सामने आई। कोरांव के लेडिय़ारी स्थित मुसहर बस्ती के गुलाब, बुल्ले और सुरेश कुमार के बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार हैं। गांव में नवीन स्वास्थ्य केंद्र भी है लेकिन फार्मासिस्ट के भरोसे। ग्रामीण कम उम्र में ही अपनी बच्चियों की शादी कर रहे हैं।

यही वजह है कि बच्चे भी सामान्य से कमजोर पैदा होते हैं। हालांकि प्रधान श्याम नारायण का कहना था कि गांव में सब ठीक है। बाल विवाह की जानकारी उन्हें नहीं है। वहीं स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी शिव सिंह ने पोषण की योजनाओं के प्रति अनभिज्ञता जताई। आंगनबाड़ी सहायिका सुषमा देवी का कहना है कि सभी पात्रों को निर्धारित राशन दिया जा रहा है। एएनएम नीलम का भी दावा है कि गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच की जाती है।



सरकारी योजना का नहीं मिला लाभ
कोरांव के बड़ोखर गांव की मेहरुन्निसा की छह माह की बच्ची गंभीर कुपोषित की श्रेणी में है। मेहरुन्निसा ने बताया कि उसे दो महीने से किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। कोरांव के पंवारी गांव की अनीता देवी का अनुभव भी इससे अलग नहीं है। उनकी तीन वर्ष की बच्ची कुपोषित है। फूलपुर ब्लाक के बौड़ई गांव में छह से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। गांव के शशि प्रकाश, संतोष कुमार और अशोक कुमार के बच्चे कुपोषित हैं। इनका कहना था कि महीनों बाद नवंबर में अनाज मिला लेकिन सिर्फ चावल और गेहूं।

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अंजलि - फोटो : अमर उजाला
कुपोषण और इसके खिलाफ लड़ाई में प्रशासनिक दावों की सच्चाई जानने के लिए अमर उजाला ने गांवों में जाकर पड़ताल की तो निराशाजनक स्थिति सामने आई। कोरांव के लेडिय़ारी स्थित मुसहर बस्ती के गुलाब, बुल्ले और सुरेश कुमार के बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार हैं। गांव में नवीन स्वास्थ्य केंद्र भी है लेकिन फार्मासिस्ट के भरोसे। ग्रामीण कम उम्र में ही अपनी बच्चियों की शादी कर रहे हैं।

यही वजह है कि बच्चे भी सामान्य से कमजोर पैदा होते हैं। हालांकि प्रधान श्याम नारायण का कहना था कि गांव में सब ठीक है। बाल विवाह की जानकारी उन्हें नहीं है। वहीं स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी शिव सिंह ने पोषण की योजनाओं के प्रति अनभिज्ञता जताई। आंगनबाड़ी सहायिका सुषमा देवी का कहना है कि सभी पात्रों को निर्धारित राशन दिया जा रहा है। एएनएम नीलम का भी दावा है कि गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच की जाती है।

सरकारी योजना का नहीं मिला लाभ
कोरांव के बड़ोखर गांव की मेहरुन्निसा की छह माह की बच्ची गंभीर कुपोषित की श्रेणी में है। मेहरुन्निसा ने बताया कि उसे दो महीने से किसी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। कोरांव के पंवारी गांव की अनीता देवी का अनुभव भी इससे अलग नहीं है। उनकी तीन वर्ष की बच्ची कुपोषित है। फूलपुर ब्लाक के बौड़ई गांव में छह से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। गांव के शशि प्रकाश, संतोष कुमार और अशोक कुमार के बच्चे कुपोषित हैं। इनका कहना था कि महीनों बाद नवंबर में अनाज मिला लेकिन सिर्फ चावल और गेहूं।

बच्चों के कुपोषित होने की नहीं थी जानकारी

ममता यादव - फोटो : अमर उजाला
दस बेड वाले सरोजनी नायडू बाल चिकित्सालय स्थित पोषण पुनर्वास केंद्र में दो बच्चे भर्ती थे। वहां भर्ती बच्चों की मां फतेहपुर की ममता एवं चाका ब्लाक के दानूपुर गांव की सरिता को बच्चों के इलाज से पहले नहीं पता था कि उनके बच्चे कुपोषित हैं। केंद्र प्रभारी राबिया और रीता का कहना है कि यहां भर्ती बच्चों की मांओं की काउंसलिंग भी की जाती है। इसके बावजूद कई बार ऐसा होता है कि बच्चे की तबीयत में सुधार होते ही परिवार वाले ले जाते हैं। इसके बाद घर पर भी उचित देखभाल नहीं कर पाते। केंद्र से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार कोरोना से पहले हर वर्ष करीब ढाई सौ बच्चे भर्ती होते थे लेकिन इस वर्ष अभी तक 100 से भी कम बच्चे आए। दिसंबर में अब तक नौ तथा नवंबर में सात ही बच्चे भर्ती किए गए थे।

मुसहर बस्ती में बदल गए हालात

ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
मेजा के जवनिया गांव के मुसहर बस्ती में कुपोषण की समस्या थी, लेकिन बस्ती में दोना पत्तल के कारोबार ने लोगों का रहन-सहन बदल दिया। जवनिया के अलावा आसपास के गांव के लोग भी शादी या अन्य आयोजनों में अब थर्माकोल के बर्तन नहीं खरीदते। बस्ती में तैयार दोना और पत्तल लेते हैं। इससे बस्ती के लोगों की आर्थिक स्थिति सुधरी तो भोजन में भी पौष्टिक आहार शामिल हो गए। इसके अलावा नियमित तौर पर स्वास्थ्य कैंप भी लगाया जाता है।

गर्भवती महिलाओं अंजली और पिंका का कहना था कि समय-समय पर उनके स्वास्थ्य की जांच होती है। इन प्रयासों का नतीजा है कि इस बस्ती में करीब 200 लोग रहते है। इनमें एक बच्ची काफी कमजोर है। उसके कुपोषित होने की बात कही जा रही है। ग्राम प्रधान रुचि के मुताबिक झोपड़ी में रहने वाले 22 परिवारों को पिछले वर्ष ही प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान मिला है। कुछ परिवारों के पास अब भी मकान नहीं है। उन्हें जल्द ही आवास योजना के अंतर्गत लाया जाएगा।
 
  कुपोषित अति कुपोषित
शहर 9548 1892
ग्रामीण 67461 11674
कुल 77009 13566

‘कुपोषण से संबंधित रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। पोषण से संबंधित और राशन आपूर्ति समेत अन्य योजनाओं की समीक्षा की गई है। जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं। जल्द ही स्थिति सुधरेगी।’ - आर.रमेश कुमार, मंडलायुक्त
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