आज की गजल से बहुत मायूसी है क्योंकि एख्तेसार की जगह स्टेटमेंट के रूप में गजल कही जा रही है। बदले हुए रंग में गजल की ताकत कमजोर हुई है। यह बातें हिंदुस्तानी एकेडेमी की ओर से ‘उर्दू गजल के बदलते अंदाज’ पर शनिवार को हुई संगोष्ठी में बतौर अध्यक्ष प्रो. शम्सुर्रहमान फारूकी ने कहीं। उन्होंने कहा दरअसल गजल में बिखरे हुए मजमून को एक तंजीम के साथ नज्म करना ही गजल है। लिखा कम जाता है इसको समझा ज्यादा जाता है। प्रोफेसर याकूब यावर ने कहा कि गजल उर्दू शायरी कह सबसे मकबूल सिन्फ है।
उर्दू जबान के आगाज से ही यह सिन्फ ही साथ-साथ चलती हुई हमारे जमाने तक आई है। इस सफर में इसने कई रंग बदले। प्रो. अब्बास रजा नय्यर जलालपुरी ने कहा कि उर्दू की नई गजल ने आसान लब्जों से अपने वक्त के मकामी और अस्री मसाइक को अपना मौजू बनाया है। एकेडेमी के सचिव बृजेश चंद्र ने कहा कि हिंदुस्तानी एकेडेमी ने हिंदी के साथ उर्दू अदब से जुड़े कई कार्यक्रम किए हैं और अनेक महत्वपूर्ण किताबों का प्रकाशन भी किया है। दूसरे सत्र में मुशायरा हुआ। जिसकी निजामत कलीम कैसर ने की। विषय परिवर्तन रविनंदन सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन डा. फाजिल अहसन हाशमी और मुशायरे का मंसूर उस्मानी ने किया।
इस अवसर पर प्रो. अमर सिंह, एम.ए. कदीर, कर्नल अबरार अहमद, डा. अशफाक हुसैन, डा. फाखरूल करीम, फज्ले हसनैन, असरार गांधी, श्रीप्रकाश मिश्र, हरिमोहन मालवीय, डा. अनुपम आनंद, त्रिवेणी दत्त शुक्ल, शिवराम उपाध्याय, विवेक, सत्यांशु, सुषमा सिंह, मीरा सिन्हा, स्नेह, सुधा, श्लेष गौतम आदि उपस्थित रहे।