इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थी का जाति प्रमाणपत्र निर्धारित प्रोफार्मा पर नहीं होने के आधार पर रद्द करना अनुचित है। कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति या जनजाति का जन्म से होता है।
प्रमाणपत्र सिर्फ इस पूर्व सुनिश्चित तथ्य की सूचना देता है इसलिए इसे मात्र निर्धारित प्रोफार्मा पर प्रमाणपत्र नहीं होने के आधार पर इसे अमान्य नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा है कि यह स्थिति ओबीसी प्रमाणपत्र से भिन्न है। चूंकि ओबीसी अभ्यर्थियों में क्रीमी लेयर तय करना होता है, इसलिए वहां प्रोफार्मा की अनिवार्यता समझी जा सकती है। मगर एससी-एसटी के मामले में ऐसी कोई शर्त नहीं है।
दीपक खरवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने दिया है। याचिका पर अधिवक्ता विजय गौतम ने पक्ष रखा। याची ने सिपाही भर्ती के लिए आवेदन किया था। कट ऑफ मॉर्क्स से अधिक अंक पाने के बावजूद उसे नियुक्ति नहीं दी गई।
सरकारी वकील का कहना था कि याची का जाति प्रमाणपत्र विज्ञापन दिए गए प्रोफार्मा के मुताबिक नहीं था, इसलिए उसका दावा स्वीकार नहीं किया गया। कोर्ट ने एसटी वर्ग के अभ्यर्थी के मामले में प्रोफार्मा को आधार बनाकर नियुक्ति देने से इंकार करना उचित नहीं है। आदेश दिया है कि याची को अनुसूचित जनजाति का मानते हुए नियमानुसार आदेश पारित करें।