न्यायालय में भी लंबित हैं मामले
सीबीआई निदेशक ने पत्र में कहा है कि परीक्षाओं से संबंधित कई मामले इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी लंबित हैं। सीबीआई को न्यायालयों के निर्देशों के तहत समय-समय पर ऐसे मामलों में स्थिति रिपोर्ट दाखिल करनी होती है। ऐसी रिपोर्टों में प्रगति की कमी और जांच की धीमी गति के कारण उच्च न्यायालय से सीबीआई के साथ-साथ राज्य सरकार के प्रति प्रतिकूल विचार आने की संभावना रहती है।
चार साल से ठप पड़ी है जांच
उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद 31 जुलाई 2017 को सरकार ने लोक सेवा आयोग की अप्रैल-2012 से मार्च-2017 तक की अवधि में घोषित परिणामों की सीबीआई जांच के दिए थे। शुरुआत में जांच काफी तेजी से बढ़ी। पीसीएस परीक्षा-2015 व एपीएस परीक्षा-2010 के मामले में मुकदमा दर्ज होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वर्ष 2021 से जांच प्रक्रिया लगभग ठप है।
एपीएस परीक्षा की जांच के लिए मिली थी विशेष अनुमति
सीबीआई को जिस कार्यकाल की परीक्षाओं की जांच करनी थी, उसमें एपीएस परीक्षा-2010 शामिल नहीं थी, लेकिन तमाम शिकायतें आने के बाद सीबीआई को जब प्रारंभिक जांच में कुछ गड़बड़ियां मिलीं तो परीक्षा की अलग से जांच के लिए प्रदेश सरकार से विशेष अनुमति ली गई। इस मामले में सीबीआई ने तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक प्रभुनाथ के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की थी, लेकिन कार्रवाई जहां की तहां अटकी रह गई।
अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री से की हस्तक्षेप की मांग
प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष अवनीश पांडेय और मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय ने यूपीपीएससी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते कहा है कि आयोग पर ऐसा कौन सा दबाव है कि चार साल बाद भी संदिग्ध लोक सेवकों के खिलाफ जांच की अनुमति नहीं दी जा सकी है। अवनीश व प्रशांत ने शासन एवं आयोग के अफसरों के बीच गठजोड़ कर आरोप लगाते हुए मांग की है कि मुख्यमंत्री इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करें, ताकि सीबीआई के समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कराने वाले अभ्यर्थियों को न्याय मिल सके।