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‘पुकार’ से तय होती महामंडलेश्वरों की हैसियत

Wed, 05 Aug 2015 01:59 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद। ‘दशनाम गुरु सुनना! अमुक महामंडलेश्वर की ओर से गुरु महराज (अखाड़े के इष्टदेव) के चरणों में (लाख रुपये) की भेंट चढ़ाई गई है।’ इस ‘पुकार’ के बाद फौरन ही यह भेंट अखाड़े के सचिवों के हाथ में होती है जिसके माध्यम से अखाड़े का कोष समृद्ध होता है। दरअसल इस प्रक्रिया को ‘पुकार’ कहते हैं, जिसके तहत महामंडलेश्वरों की ओर से न सिर्फ धनराशि, बल्कि कई बार सोने-चांदी की बहुमूल्य वस्तुएं भी इष्टदेव को चढ़ाई जाती हैं। ‘पुकार’ की राशि से जहां महामंडलेश्वर की हैसियत तय होती है, वहींइस आधार पर अखाड़े की ओर से उनकी सुख सुविधाओं, मान-सम्मान का मानक तय होता है।
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कुंभ और अर्धकुंभ मेले में ही अखाड़ों की दुुनिया सजती है। महामंडलेश्वर अखाड़ों की माला के मनके होते हैं, उनकी ओर से ‘पुकार’ में चढ़ाई गई लाखों रुपये की राशि से अखाड़ों को बड़ी आय होती है। महामंडलेश्वर होने के नाते उन्हें विशिष्ट धर्मगुरु के तौर पर मान-सम्मान मिलता है, उनका वैभव बढ़ता है। वहीं प्रशासन की ओर से भी महामंडलेश्वरों के शिविरों की ओर अतिरिक्त ध्यान दिया जाता है।

दशनामी अखाड़ों में नया महामंडलेश्वर बनने पर भी उसकी ओर से अखाड़ों को सहयोग के तौर पर बड़ी राशि भेंट की जाती है। वहीं प्रत्येक शाही स्नान केबाद और प्रमुख भंडारों के समय भी अखाड़े की छावनी में धर्मध्वजा केनीचे बने इष्टदेव के मंदिर में ‘पुकार’ के माध्यम से ही महामंडलेश्वरों की ओर से सामर्थ्य के मुताबिक इष्टदेव को चढ़ावा यानी अखाड़े को ‘भेंट‘ दी जाती है। बीते प्रयाग कुंभ में ही निरंजनी अखाड़े की ओर से महामंडलेश्वर बनाए जाने पर निर्भयानंद ने आराध्य की ‘पुकार’ में दो लाख 51 हजार रुपये की भेंट चढ़ाई थी।
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0 दो कुंभ मेलों के बीच तिगुनी हुई महामंडलेश्वरों की संख्या
0 संख्या के मुताबिक अखाड़ों की आय भी तीन गुने से ज्यादा
इलाहाबाद। जिस अख्राड़े में जितने महामंडलेश्वर, उस अखाड़े की उतनी ही आय होनी तय है। प्रत्येक अर्धकुंभ, कुंभ के बाद प्रत्येक अखाड़े में महांडलेश्वरों की संख्या बढ़ जाती है। वर्ष 2001 से लेकर बीते प्रयाग महाकुंभ तक महामंडलेश्वरों की संख्या में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो गई है। ऐसे में अखाड़ों की आय भी तीन गुनी बढ़ गई है। अखाड़ों की मुहर और मान्यता के लिए ही महामंडलेश्वर बनने वाले संतों की ओर से अखाड़ों को लाखों रुपये की भेंट दी जाती है। इसमें पुकार, भंडारा के अतिरिक्त कई तरह के अन्य अनुदान भी शामिल हैं। ऐसे में जिसके जितने महामंडलेश्वर, वह अखाड़ा कुँभ के बाद उतना ही धनवान हो जाता है और अखाड़ों की मिली धनराशि सचिवों के निर्देश पर खर्च होती है।
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