इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जैसी है, जहां है कि शर्त पर नीलामी में जमीन खरीदने वाले से संपत्ति की वास्तविक स्थिति की जांच की अपेक्षा की जाती है। बोली लगाने से पहले खरीदार को मौके पर जाकर जमीन की स्थिति, पहुंच और व्यावसायिक उपयोगिता की पड़ताल करनी चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जैसी है, जहां है कि शर्त पर नीलामी में जमीन खरीदने वाले से संपत्ति की वास्तविक स्थिति की जांच की अपेक्षा की जाती है। बोली लगाने से पहले खरीदार को मौके पर जाकर जमीन की स्थिति, पहुंच और व्यावसायिक उपयोगिता की पड़ताल करनी चाहिए। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने गोरखपुर विकास प्राधिकरण (जीडीए) के बुद्ध विहार पार्ट-ए में दो व्यावसायिक भूखंडों की ई-नीलामी से जुड़े मामले में की।
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याची कंपनी ने करीब 1.02 करोड़ रुपये पंजीकरण राशि जमा कर दो भूखंडों के लिए करीब 34.45 करोड़ और 3.85 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। कंपनी तय समय में बोली की 40 फीसदी राशि जमा नहीं कर सकी। बाद में उसने दावा किया कि देवरिया बाईपास पर बने फ्लाईओवर से भूखंडों का प्रवेश-निकास प्रभावित हो गया और उनकी व्यावसायिक उपयोगिता कम हो गई। जीडीए ने आवंटन निरस्त कर पंजीकरण राशि जब्त कर ली।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि कंपनी ने नीलामी से पहले भूखंडों का भौतिक निरीक्षण किया था। फ्लाईओवर नीलामी के समय मौजूद था, इसलिए एक समझदार और सतर्क खरीदार सामान्य निरीक्षण में स्थिति का पता लगा सकता था। हालांकि, कोर्ट ने 40 फीसदी राशि जमा न करने के आधार पर याची की रकम जब्त करने के जीडीए के फैसले को गलत माना। नीलामी की शर्त में पूरी बोली राशि समय पर जमा न करने पर जब्ती का प्रावधान था। इसके बावजूद कंपनी को रकम वापस नहीं मिली, क्योंकि उसने जब्ती की शर्त को चुनौती नहीं दी थी। लिहाजा, कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।