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बुलंदशहर मुआवजा घोटाले की पत्रावली तलब

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बुलंदशहर की खुर्जा तहसील में यूपी एसआईडीसी के ग्रोथ सेंटर के लिए अधिग्रहीत जमीन पर अवैध कब्जेदारों को करोड़ों रुपये का मुआवजा देने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने अधिग्रहीत भूमि और मुआवजा वितरण आदि की मूल पत्रावली तलब कर ली है। कहा है कि क्यों न इस मामले की जांच कराकर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। इस जमीन का किसानों को पहले ही मुआवजा दिया जा चुका था और अतिक्रमण कर अवैध कब्जा जमाए लोगों को भी करोड़ों का मुआवजा भुगतान कर दिया गया। इस प्रकार से सरकार को एक ही जमीन के लिए दो-दो बार मुआवजा देकर करोड़ों की चपत लगाई गई।
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कोर्ट ने यूपीएसआईडीसी को 20 दिसंबर को मूल पत्रावली पेश करने का आदेश दिया है, ताकि इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सके। यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने कमल सिंह की जनहित याचिका पर दिया है। कोर्ट ने प्रदेश के महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह से पूछा था कि एक बार मुआवजा भुगतान करने के बाद उसी जमीन पर अतिक्रमण कर अवैध रूप से रह रहे लोगों को करोड़ों का मुआवजा दोबारा कैसे दे दिया गया? इस घोटाले के लिए कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं? उनका नाम बताएं। महाधिवक्ता ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर तमाम अधिकारियों के नामों की जानकारी दी और कहा इसमें निगम के इंजीनियर जिम्मेदार हैं। जिन्होंने जमीन हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के लिए दी और दोबारा मुआवजे के भुगतान का प्रस्ताव किया। कोर्ट ने कहा कि जिस जमीन का एक बार मुआवजा दे दिया गया था और वह जमीन यूपीएसआईडीसी की हो गई थी, तो उसी जमीन को दूसरी कंपनी को देकर उससे अवैध रूप से मुआवजा क्यों दिलाया गया?
निगम ने 721 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से भुगतान करने का प्रस्ताव दिया, जबकि इसी जमीन का बहुत पहले निगम ने 93 लाख के मुआवजे का भुगतान कर दिया था। अब उसी जमीन को टेहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कार्पोरेशन इंडिया को थर्मल पावर प्रोजेक्ट तैयार करने के लिए दे दिया गया है। इस कंपनी से तीन करोड़ 80 लाख रुपये का भुगतान कराया गया। यह पैसा न तो निगम को मिला और न ही राज्य सरकार को। कोर्ट ने कहा कि क्यों न एफआईआर दर्ज कर जांच कराई जाए। याचिका की सुनवाई 20 दिसंबर को होगी।
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