शिक्षकों को मांगी जा रही थी रिश्वत
अभियोजन के अनुसार मृतक कृष्ण मोहन सिंह, ओंकार सिंह और अपर्णा तिवारी वर्ष 2016 में सहायक शिक्षक नियुक्त हुए थे। बाद में उनकी नियुक्तियां निरस्त कर दी गईं, जिसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। फरवरी 2025 में हाईकोर्ट ने निरस्तीकरण आदेश रद्द कर मामले पर पुनर्विचार का निर्देश दिया था। आरोप है कि इसी आदेश के अनुपालन के लिए बीएसए कार्यालय में रिश्वत मांगी गई।
कोर्ट के समक्ष पेश आत्महत्या पत्र में मृतक ने विस्तार से लिखा कि तीनों शिक्षकों से पहले 20-20 लाख रुपये मांगे गए, बाद में सौदा 16-16 लाख रुपये पर तय हुआ। सुसाइड नोट में यह भी उल्लेख है कि रकम जुटाने के लिए शिक्षकों ने जमीन गिरवी रखी, गहने बैंक में जमा किए और रिश्तेदारों से उधार लिया। मृतक ने लिखा कि लगातार दबाव, अपमान और वसूली से वह टूट चुका था।
शिक्षक ने लिखा था चार पन्नों का सुसाइड नोट
जांच के दौरान पुलिस को चार पन्नों का सुसाइड नोट, ऑडियो क्लिप, वीडियो रिकॉर्डिंग और सीसीटीवी फुटेज मिले। एक वीडियो में मृतक ने कथित तौर पर कहा कि “16 लाख रुपये बीएसए मैडम ने ले लिए” और इसके बावजूद उसे प्रताड़ित किया जा रहा है। जांच अधिकारी ने सहकर्मी शिक्षक ओंकार सिंह का बयान भी दर्ज किया, जिसमें कथित रिश्वतखोरी की पूरी प्रक्रिया और रकम देने का विवरण सामने आया।
शालिनी श्रीवास्तव की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। बचाव पक्ष ने कहा कि सुसाइड नोट में उनका नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया और आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई ठोस आरोप नहीं बनता। यह भी कहा गया कि उन्हें पहले ही निलंबित किया जा चुका है और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
हाईकोर्ट ने बीएसए पर की तल्ख टिप्पणी
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि जांच में मिले ऑडियो-वीडियो साक्ष्य, गवाहों के बयान और सीसीटीवी फुटेज रिश्वत मांगने और मानसिक उत्पीड़न की पुष्टि करते हैं। अभियोजन ने अदालत को बताया कि मृतक 20 फरवरी 2026 को बीएसए कार्यालय गया था, जहां उसे प्रताड़ित किया गया और अगले दिन उसने आत्महत्या कर ली।
कोर्ट ने कहा कि भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि भ्रष्टाचार मुक्त समाज सुनिश्चित करने के लिए किसी आरोपी की स्वतंत्रता सीमित करनी पड़े तो अदालतों को इससे हिचकना नहीं चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी कार्यालयों को आदेश बेचने की खुली दुकान नहीं बनने दिया जा सकता। अदालत ने माना कि मृतक और अन्य शिक्षकों से अवैध धन उगाही के आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और उपलब्ध साक्ष्यों से यह नहीं लगता कि आवेदिका को झूठा फंसाया गया है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने शालिनी श्रीवास्तव की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी।