फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जब कम किताबों में निकल रहे टॉपर तो क्यों लाद रहे बोझ

Wed, 17 Dec 2014 11:38 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, इलाहाबाद
विज्ञापन
विज्ञापन
पब्लिक स्कूलों की चकाचौंध में पड़कर अभिभावक अपने बच्चों का बचपन छीनने को उतारू हैं। स्टेट्स सिंबल बने ये स्कूल अभिभावकों के लिए भले ही आत्म संतुष्टि के कारक हों लेकिन इन स्कूलों में बच्चों पर लादा गया किताबों का बोझ निश्चित तौर पर बच्चों को शारीरिक एवं मानसिक तौर पर कमजोर बना रहा है।
विज्ञापन


केन्द्रीय विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में छात्रों को एनसीईआरटी की किताबें ही लागू हैं। सरकारी एवं निजी स्कूलों की किताबों के मूल्य में भी एक और छह गुने का अंतर देखा जाता है। पाठ्यक्रम विशेषज्ञ राजसिंह का कहना है कि एनसीईआरटी की किताबें पढ़कर जब केन्द्रीय एवं नवोदय विद्यालयों के बच्चे इंजीनियरिंग, मेडिकल सहित देश की सभी प्रवेश परीक्षाओं में अच्छी रैंक के साथ प्रवेश पा रहे हैं तो सीबीएसई से जुड़े निजी स्कूल आखिर क्यों बच्चों पर एक के बदले तीन किताबों का बोझ लाद रहे हैं।

तुलनात्मक दृष्टि से केन्द्रीय एवं नवोदय विद्यालयों का रिजल्ट निजी स्कूलों पर भारी है। 2013 में सीबीएसई की ओर से 10वीं के इलाहाबाद रीजन के रिजल्ट में 81 नवोदय विद्यालयों का परिणाम 99.55 फीसदी, 134 केन्द्रीय विद्यालयों का 99.65 एवं 1605 पब्लिक स्कूलों का परिणाम 99.28 फीसदी रहा। इलाहाबाद स्थित नौ केन्द्रीय विद्यालयों एवं एक जवाहर नवोदय विद्यालय का परिणाम भी पब्लिक स्कूलों पर भारी पड़ा।
विज्ञापन


पाठ्यक्रम विशेषज्ञ प्रभाकर त्रिपाठी का कहना है कि सरकार ही निजी स्कूलों में किताबों की मनमानी के लिए जिम्मेदार है। सरकारी एवं निजी स्कूलों में एक जैसी किताबें लागू करने के लिए सरकार निजी प्रकाशकों पर रोक लगाए। एनसीईआरटी की किताबों की जगह निजी प्रकाशकों की पुस्तकें लागू करने वाले स्कूल तर्क देते हैं कि निजी प्रकाशकों की किताबों में अधिक तथ्य रोचक तरीके से मौजूद हैं। केन्द्रीय एवं नवोदय विद्यालयों में प्रवेश में परेशानी होने के कारण भी निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। यदि इन विद्यालयों में प्रवेश हो तो फिर क्यों अधिक फीस में बच्चों को निजी स्कूलों में भेजें।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें