इलाहाबाद। बड़ों के लिए न सही, पर इस भीषण गर्मी में बच्चों के लिए स्कूली बसों या अन्य वाहनों में बैठना उनकी जान के लिए मुसीबत बन गया है। कहने को भले ही पारा 42 से 45 डिग्री के बीच झूल रहा हो लेकिन स्कूली वाहनों में प्रवेश करते ही गर्मी अधिक महसूस होने लगती है। यह लाजिमी भी है। इंजन की गर्मी और वाहनों में लगे लोहे एवं अन्य धातुओं की गर्मी पारे में दो से तीन डिग्री तक का इजाफा कर देती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इतने तापमान में किसी भी बच्चे को हीट स्ट्रोक हो सकता है और अगर इलाज में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो बच्चे की जान को भी खतरा हो सकता है। हालांकि स्कूल प्रबंधन और जिला प्रशासन के अफसरों को बच्चों की यह दिक्कत महसूस नहीं हो रही है। भीषण गर्मी के बावजूद ज्यादातर स्कूल खुले हुए हैं।
यह सभी जानते हैं कि साल में सबसे गर्म मई का महीना होता है। इसके बावजूद ज्यादातर स्कूलों ने अब तक गर्मी की छुट्टी घोषित नहीं की है जबकि तापमान सिर चढ़कर बोल रहा है। ऐसे में स्कूली बच्चों के लिए भीषण गर्मी को झेल पाना मुश्किल हो गया है। स्कूली वाहनों में बैठने वाले बच्चों की हालत और भी खराब है। उसमें एसी भी नहीं लगे होते हैं। स्कूल छूटने से काफी पहले बसें स्कूल के बाहर खड़ी कर दी जाती है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों के मुताबिक धूप में खड़ी बस का तापमान बाहर के तापमान से दो-तीन डिग्री तक अधिक हो सकता है। बस चलने पर लू के थपेड़े भी तेजी से अंदर आते हैं।
अगर शीशा बंद किया तो उमस बढ़ने लगती है। ऐसे में दोनों ही परिस्थितियों में बच्चों को मुसीबत ही झेलनी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पारा 40 डिग्री के ऊपर जाते ही बच्चों पर बीमारी का खतरा मंडराने लगता है। उन्हें डायरिया हो सकता है। अगर बाहर का तापमान 44 डिग्री है और वाहन में 46 से 47 डिग्री तो बच्चों के लिए यह बेहद खतरनाक है। इसमें सीधे हीट स्ट्रोक होता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस खतरे से बचने का एक ही तरीका है कि दिन के वक्त बच्चों को घर से बाहन न जाने दें। अब देखना है कि इस सलाह को स्कूल प्रबंधन और
‘एक जगह खड़ी बस में ग्रीन हाउस का प्रभाव बन जाता है। इससे गर्मी और बढ़ती है। साथ ही इंजन की गर्मी और बसों में लगे लोहे एवं अन्य धातुओं के कारण भी तापमान तेजी से बढ़ता है। यही वजह है कि वाहनों के बाहर और भीतर के भीतर के तापमान में अंतर होता है।’
एमएनएनआईटी में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रो. आरके श्रीवास्तव
‘तेजी से बढ़ता तापमान सेहत के लिए खतरनाक हैं। अगर वायुमंडल में आर्र्दता तेजी से गिरती है तो हाइपर पाइरेक्सिया, हीट स्ट्रोक का खतरा हो जाता है। बच्चों के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से बीमारियां जल्दी हमला बोलती हैं। ऐसे में यही प्रयास होना चाहिए कि बच्चों को धूप में न निकलने दें।’ प्रो. अनुभा, मेडिसिन विभाग, मेडिकल कालेज
‘पारा 40 डिग्री पार करते ही बच्चों पर बीमारियों का खतरा मंडराने लगता है। डायरिया से इसकी शुरुआत होती है। अगर तापमान 45 से 47 डिग्री तक पहुंच गया तो थोड़ी सी लापरवाही बच्चे की जान को खतरे में डाल सकती है। स्कूल बसों एवं अन्य स्कूली वाहनों में अगर एसी नहीं लगा है और खिड़की खुली है तो लू के थपेड़े बच्चों के लिए और अधिक खतरनाक साबित हो सकते हैं। बेहतर है कि बच्चों को धूप में निकलने से रोकें।’
डॉ. ओपी त्रिपाठी, वरिष्ठ फिजिशियन, बेली अस्पताल
हीट स्ट्रोक, हाइपर पाइरेक्सिया के लक्षण
0 मरीज को जबरदस्त प्यास लगती है
0 थकान होती है और शरीर दर्द से टूटने लगता है
0 बेहोशी आने के साथ ही मरीज कांपने लगता है।
0 स्थिति ज्यादा खराब हो तो मरीज बेहोश हो जाता है।
0 शरीर का तापमान 104 फारेनहाइट पार कर जाता है, जो बेहद खतरनाक होता है
कैसे करें बचाव
0 धूप में निकलने से बचें।
0 यदि विशेष परिस्थितियों में निकलना पड़े तो पूरे शरीर ढककर निकलें।
0 पानी के साथ ज्यादा से ज्यादा जूस पिएं
0 समय-समय पर ओआरएस, इलेक्ट्रॉल पिएं
0 चक्कर आने लगे तो तत्काल कुशल चिकित्सक से संपर्क करें
0 हीट स्ट्रोक एवं हाइपर पाइरेक्सिया होने पर मरीज को आइस बॉथ कराएं
0 सिर पर बेहद ठंडे पानी की पट्टियां रखे