इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई हिंदू पुरुष अपनी नाजायज संतान को गोद ले सकता है। हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम में जैविक पिता को अपनी ही नाजायज संतान को गोद लेने से रोकने वाला कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, इसलिए केवल इस आधार पर दत्तक ग्रहण अमान्य नहीं किया जा सकता कि गोद लेने वाला व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता भी है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकल पीठ ने बस्ती में वर्ष 1970 में हुए दत्तक ग्रहण से जुड़े मामले में बुधराम व अन्य की ओर से रामकेश के खिलाफ दाखिल दूसरी अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने रामकेश के पक्ष में प्रथम अपीलीय अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा कि रामकेश को बदलू ने विधिवत गोद लिया था और बदलू ही उसका जैविक पिता था।
मामले के अनुसार, रामकेश की मां का विवाह बुधराम से हुआ था लेकिन उसका जैविक पिता बदलू था। रामकेश के अनुसार, बदलू ने आठ नवंबर 1970 को उसे गोद लिया। बाद में उसने बदलू की ओर से 19 जून 1973 को प्रतिवादियों के पक्ष में किए गए बिक्री विलेख को चुनौती दी। आरोप था कि इलाज के बहाने बदलू को ले जाकर धोखाधड़ी से दस्तावेज करा लिया गया।
हाईकोर्ट ने अधिनियम की धारा-10 का हवाला देते हुए कहा कि नाजायज होना अपने आप में दत्तक ग्रहण की अयोग्यता नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 1970 में रजिस्टर्ड दत्तक विलेख अनिवार्य नहीं था। दत्तक ग्रहण में बच्चे को वास्तविक रूप से देना और लेना महत्वपूर्ण है और उपलब्ध साक्ष्यों से यह प्रक्रिया साबित हुई।
कोर्ट ने माना कि प्रथम अपीलीय अदालत ने धारा 9(4) की गलत व्याख्या की थी लेकिन इससे दत्तक ग्रहण अमान्य नहीं हुआ। दूसरी ओर, बिक्री विलेख के संबंध में कोर्ट ने कहा कि रजिस्टर्ड दस्तावेज भी धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव या स्वतंत्र सहमति के अभाव में चुनौती से परे नहीं है। निचली अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने दूसरी अपील खारिज कर दी।