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‘भारत रत्न’ को मिला भारत रत्न

Thu, 25 Dec 2014 01:59 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
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महामना मालवीय तो यों भी भारत रत्न हैं, यह बात और है कि औपचारिक सरकारी घोषणा अब हुई है। उन्हें भारत रत्न देने का संवाद प्रसारित कर वस्तुत: सरकार अपना ही कल्याण करने जा रही है। यह सारे अलंकरण वास्तव में सारे अंतर्विरोधों से ऊपर होने चाहिए। महामना के लोकनाथ अहियापुर का बाशिंदा होने के कारण स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहा हूं। इस गौरव में यद्यपि राजनीति की छौंक-बघार से असुविधा भी होती है।
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संस्कृति के सवाल पर आज भी वह उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने जीवन काल में थे। पिता स्वर्गीय उमाकांत मालवीय से उनकी गौरव-गाथा सुनता बड़ा हुआ हूं। हमारी साझी विरासत की वह ज़िंदा मिसाल हैं, तभी तो जनाब अकबर इलाहाबादी ने बड़े आदर सम्मान और स्नेह के साथ उन्हें यह शेर समर्पित किया था-
‘लाख शेख ने दाढ़ी बढ़ायी सन की सी,
मगर वो बात कहां मौलवी मदन की सी।’

हिंदी साहित्य सम्मेलन हो या भारती भवन पुस्तकालय, उनकी स्मृतियों के अनन्य प्रतीक हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के संदर्भ में तो वह किसी दरवेश की तरह सड़क पर ही आ गए थे। शिक्षा की अलख जगाने का संकल्प उनकी सांस-सांस से जुड़ गया था। वह बाकायद जैसे भिक्षारन के लिए ही निकल पड़े थे। चंदा इकट्ठा कर रहे थे। एक सेठ ने बहुत बेमन से चंदा दिया तो बोले कोई बात नहीं है, इस पैसे को विश्वविद्यालय परिसर में बनने वाले शौचालय के निर्माण में इस्तेमाल कर लेंगे, आखिर वह भी तो व्यक्ति की एक अहम ज़रूरत है।
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त्रिवेणी के अभिमंत्रित जल को काशी की गंगा में प्रवहमान कर उन्होंने गंगा यमुना के बीच लुप्त सरस्वती को काशी की धरती पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के रूप में मूर्त किया। एक सपने को अपने उद्भट जीवन के बल पर साकार किया। कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में उनकी यादें बड़े जतन से सहेजी गई हैं। ब्रिटिश सरकार भी उनके अपराजेय स्वाभिमान के सामने नत होती थी। महात्मा गांधी, गुरुदेव, रवींद्र नाथ टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ उनके सत्संग के चित्र आज भी एक अकथ कहानी कहते हैं। वह इंग्लैंड भी जाते थे तो देश की पावन माटी व गंगाजल ले जाना नहीं भूलते थे।

वह हिंदू संस्कृति नहीं वरन भारतीय संस्कृति के पोषक थे, बल्कि यदि कहें कि भारतीय संस्कृति ही सशरीर उनके रूप में उपस्थित हो गई थी, तो कोई अतिरंजना नहीं होगी। उन्होंने संस्कृति की नयी व्याख्या की है, जो कविवर रामधारी सिंह दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की व्याख्या से सर्वथा मेल खाती है। उनमें चौक सांस लेता था, तो नखासकोना भी दिल की तरह धड़कता था। सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने का निर्णय लेकर देर से ही सही एक आवश्यक भूल सुधार किया है।
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