इलाहाबाद। हिन्दी दिवस पर एक बार फिर यह सवाल मुखर हो उठा है कि तकरीबन सवा सौ करोड़ भारतीयों की राजभाषा हिन्दी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो दूर, राष्ट्रभाषा हिन्दी के तौर पर भी अपेक्षित दर्जा नहीं हासिल कर सकी है। आज हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह या हिन्दी पखवाड़ा जैसे आयोजन महज रस्म अदायगी तक ही सीमित होकर रह गए हैं जबकि इनका निहितार्थ हिन्दी को उसका अपेक्षित मान दिलाने सहित हिन्दी में अधिकाधिक काम करने के लिए लोगों को प्रेरित, प्रोत्साहित करना है।
यह हैरत की बात लेकिन सच है कि अंग्रेजी आज जहां दुनिया के 101 देशों में बोली जाती है, वहीं हिन्दी सिर्फ चार देशों तक सिमट कर रह गई है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र संघ की छह आधिकारिक भाषाओं में सवा सौ करोड़ भारतीयों की राजभाषा हिन्दी नहीं बल्कि अरबी शामिल है। हिन्दी के मनीषियों का आरोप है कि हिन्दी को लेकर देश में ही दोहरी नीति अपनाई जा रही है, वहीं प्रांतीय भाषाओं के वर्चस्व में हिन्दी को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए जूझना पड़ रहा है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय फलक पर हिन्दी के वर्चस्व की कल्पना कैसे की जा सकती है।
भारतभारती से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार दूथनाथ सिंह कहते हैं, हिन्दी को थोपने के लिए हिन्दी दिवस या फिर पखवाड़ा मनाने की औपचारिकता का कोई औचित्य नहीं है। हिन्दी को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए, ऐसा करके देखिए तो रस्मरिवाजों से इतर हिन्दी स्वाभाविक रूप से फल-फूल जाएगी। इसके प्रति लोगों में प्रेम जगाकर ही स्वभाविक रूप से हिन्दी के विरोध को खत्म किया जा सकेगा। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान दिलाने को भारतेंदु जैसे ही प्रयास करने होंगे जिसमें हिन्दी और उर्दू दोनों का ही मेल था। तत्सम प्रधान भाषा को बढ़ावा ठीक नहीं।
वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर राजेंद्र कुमार कहते हैं, हिन्दी दिवस या फिर पखवाड़ा मनाकर औपचारिकता निभाई जाती है। जब तक इसके प्रति भीतर से अनुराग नहीं होगा, हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का सवाल ऐसे ही मुंह चिढ़ाता रहेगा। असल मायने में हिन्दी एक भाषा नहीं बल्कि बोलियों का परिवार है। सिर्फ हिन्दी-हिन्दी करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि इसे लेकर दूसरी बोलियों में उपजे अविश्वास को दूर करना होगा। ज्यादा से ज्यादा लोगों को हिन्दी से जोड़ने के लिए हमें उनकी बोलियां भी उतनी ही शिद्दत से सीखनी होंगी।
सुपरिचित गीतकार यश मालवीय कहते हैं, जब तक हिन्दी का सवाल राष्ट्रीयता, भारतीयता, हमारी पहचान से नहीं जुड़ेगा, हिन्दी दिवस जैसे आयोजनों का कोई अर्थ नहीं रहेगा। हिन्दी के सवाल को उद्देश्यपरक या योजनापरक तरीके से राष्ट्रीय मुद्दे की तरह ही लेना होगा। जरूरी है कि हिन्दी दिवस नहीं ‘हिन्दी समय’ की संकल्पना बने। हिन्दी को महानदी मानते हुए इसमें सभी बोलियों का समावेश करना होगा। हिन्दी जब तक सांस्कृतिक धर्म की तरह स्वीकार नहीं किया जाएगा और रोजगार की भाषा नहीं बनाया जाएगा, इसका विकास संभव नहीं हो सकेगा।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर संतोष भदौरिया कहते हैं, हिन्दी की दशा, दुर्दशा के लिए व्यवहार से ज्यादा नीति नियंताओं की ओर से थोपी गई दिक्कतें हैं। भोपाल का विश्व हिन्दी सम्मेलन इसका ताजा उदाहरण है, जहां हमने भाषा और साहित्य को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। भाषा प्रयोग यानी गली-मोहल्ले और चौपालों से बनती है। सरकारी नीतियों के कारण ही हिन्दी और सहभाषाओं के बीच का सामंजस्य भी कम हुआ है। कहने और करने के बीच की खाई को पाटे बगैर हिन्दी का सवाल अनुत्तरित ही रहेगा। हिन्दी के लिए एक ईमानदार कोशिश जरूरी है।