इलाहाबाद। पर्यावरण को बचाने का अर्थ परिंदों को बचाना भी है। परिंदे प्रकृति के दूत हैं, इसीलिए वे हमें और हमारे पर्यावरण दोनों को संवारते और संदेश देते हैं। बीते दिनों जब ‘अमर उजाला’ ने यह मुहिम शुरू की तो यह अकारण नहीं था। बाद में ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपील की कि इसे परंपरा का हिस्सा नहीं बनाया गया तो आने वाले दिन किसी के लिए सुरक्षित नहीं होंगे। इसीलिए पशु-पक्षियों को दाना-पानी देेने को अपनी आदत में शुमार कर लें अन्यथा खुद के लिए भी दाना-पानी का संकट और विकराल हो जाएगा। पशु-पक्षियों, पौधों और हरियाली का होना ही हमारे होने की शर्त है, जब तक इनका जीवन बना और बचा रहेगा, तब तक ही हमारा भी अस्तित्व होगा।
पक्षियों और तितलियों की कमी से खेती पर बुरा असर पड़ा है। इससे प्राकृतिक तरीके से पराग कण ले जाने की प्रक्रिया धीमी पड़ गई है और वानस्पतिक प्रजातियाें का स्थानांतरण भी थम सा गया है। कृत्रिम विधियों से इस कमी की भरपाई नहीं हो पा रही है। इससे पर्यावरण संतुलन को तो गंभीर खतरा पैदा हो ही गया है, बढ़ती जनसंख्या के लिए भरपेट भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती भी और बढ़ गई है। भारतीय संस्कृति और परंपरा में भी जीव-जंतुओं को खासा महत्व दिया गया है। कौआ के लिए छत पर रोटी रखना, चीटियों, मछलियों के लिए आटा रखना, गाय, कुत्ते को रोटी देना हमारी परंपरा रही है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि पर्यावरण संतुलन के बहाने इन परंपराओं का वैज्ञानिक महत्व है। अनियंत्रित विकास की दौड़ में परंपराओं का पुनर्जीवन और भी जरूरी हो गया है।
राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के समारोह में आए बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ इनवायरमेंटल एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक डॉ.अखिलेश रघुवंशी ने बताया कि तितलियां, मधुमक्खी, पक्षियां परागकण एक से दूसरे स्थान तक ले जाने के मुख्य प्राकृतिक स्त्रोत हैं। फसलों में उत्पादन में इसका खासा महत्व है। पौधों के बीज आदि को एक से दूसरे जगह पर ले जाने के लिए ये प्राकृतिक संवाहक हैं। इससे जैविक संपदा को विस्तार मिलता है। केचुओं को किसानों का मित्र कहा गया है। गिद्ध तथा अन्य पक्षी पर्यावरण की सफाई करने के साथ संतुलन भी स्थापित करते हैं लेकिन इन जीवों का अस्तित्व ही खतरे में है। तितलियों की कई प्रजातियां खत्म तो कई लुप्त के कगार पर हैं। सो पराग कणों तथा पौधों के स्थानांतरण की प्रक्रिया ठप हो गई है।
बीएचयू के ही प्रोफेसर जितेंद्र पांडेय कहते हैं, गिद्ध के साथ गौरैया, कौआ, तोता, मैना, बुलबुल, सारस, तितलियां, मधुमक्खी आदि विलुप्त जीवों की श्रेणी में आ गए हैं। मुश्किल यह कि खतरा कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। यह पर्यावरण केलिए गंभीर खतरे का संकेत है। वन सरंक्षक के.प्रवीण राव और प्रभागीय वन अधिकारी मनोज कहते हैं, इन पक्षियों का पर्यावरण में खासा महत्व है। परंपराओं से जुड़कर तथा अनियंत्रित विकास को रोककर ही इन्हें बचाया जा सकता है।
पक्षियों तथा अन्य जीवों के विलुप्प्त होने की मुख्य वजह अनियंत्रित विकास है। गौरैया खुद अपना घोसला नहीं बनाती। कोई आधार मिल जाए तो उसमें तिनका रखकर अपने रहने का इंतजाम करती है। छप्पर के मकान खत्म होने तथा पेड़ों की संख्या घटने से गौरैया के साथ अन्य पक्षियों का भी आशियाना छिन गया है। कृषि योग्य भूमि सिमटती जा रही है तो तालाब तथा पानी के अन्य स्त्रोत भी कम हो गए हैं। इससे उनका दाना-पानी भी छिनता जा रहा है। रही-सही कसर प्रदूषण तथा खेती में रसायनों के बढ़ते इस्तेमाल ने पूरी कर दी है। वन सरंक्षक के.प्रवीण राव कहते हैं, इससे उनकी प्रजनन की क्षमता कम हो गई है। डॉ.अखिलेश रघुवंशी कहते हैं, प्रदूषण की वजह से अंडों की कोशिकाएं कमजोर हो जाती हैं। जानवर और पक्षी आपदाओं और प्रदूषण के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। उनका यही गुण खतरों से आगाह करता है लेकिन अब उनका अस्तित्व ही संकट में है।
अल्सटोनिया (शैतान वृक्ष), यूकेलिप्टस आदि वृक्ष पक्षियों के दुश्मन होते हैं। इनकी महक से पक्षी भाग जाते हैं। इसलिए बरगद, इमली, गूलर, पाकड़, पीपल आदि के पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाए। स्थानीय प्रजातियाें के पौधे भी रोपे जाएं। पक्षियों को दाना-पानी देने की परंपरा को जिम्मेदारी से आगे बढ़ाएं। घर बनाते समय पक्षियों का भी ध्यान रखें। घर में पेड़ जरूर लगाएं।