बीच में बताती रहीं कि महादेवी से बचपन के उनके कई किस्से भी हैं, जिन्हें यहां सुनाने का वक्त नहीं है, लेकिन उन स्मृतियों को छोड़ पाना भी संभव नहीं लगता। इसके बाद 1975 में आपातकाल के दौर में लिखी विजयदेव नारायण शाही की गजल को स्वरों में बांधा। उनकी बेटी सुष्मिता भी उन पलों की साक्षी बनीं। बोल थे- जमीं की खाक फिर छानिए ...यहां कुछ थक के बैठे हैं/ जहां कहिए वहां जाएं...। उनके स्वरों में बज्में ही इसी शहर की गलियों से गुनगुनाती, झूमती, इतराती हुई गुजरती रहीं।
संगीत के इस कुंभ में डुबकी लगाने के लिए वहां पुराने गुणीजन भी थे और नई पीढ़ी भी स्वलहरियों में आशा की नई कोपलों को निहार रही थी। अंत में शुभा ने भजन के बोल अजर झरै रस गगन गुफा में....बिन बाजा झनकार उठे... की प्रस्तुति की। तबले पर अनीश प्रधान, हारमोनियम पर सुधीर और तानपूरे पर अंजना और वृंदा ने संगत की। फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया, रामचारी और जफर बख्त ने आभार प्रकाश किया।