फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बज्म ए विरासत : शुभा केे कंठ में उतरीं महादेवी-निराला की कविताएं, गीतों-गजलों से पिरोई सुरों की माला

Sun, 22 Dec 2024 02:12 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

गीतों-गजलों को सुरों की माला में पिरोने वाली शुभा ने सुर, लय-ताल की त्रिवेणी बहाई तो लोग संगीत की पावन धारा में डुबकी लगाकर अघाते रहे। ठुमरी दादरा और ख्याल गायन की मल्लिका मानी जाने वाली पद्मश्री शुभा मुद्गल अपने ही शहर में बज्म-ए-विरासत में मेहमान के रूप में आईं थीं।
विज्ञापन
शुभा मुद्गल, जानी मानी शास्त्रीय गायिका। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जानी मानी शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल ने शनिवार को महाकुंभ से पहले सहित्यिक-सांगीतिक यात्रा के तहत सुरों के महाकुंभ में डुबकी लगाई। मंच पर बचपन की स्मृतियों से घिरीं शुभा ने महाप्राण निराला और महीयशी महादेवी वर्मा की कविताओं के बाद विजयदेव नारायण शाही की गजलों को कंठ में उतारकर मिट्टी से अपने गहरे जुड़ाव हरा-ताजा और गाढ़ा किया।

विज्ञापन


गीतों-गजलों को सुरों की माला में पिरोने वाली शुभा ने सुर, लय-ताल की त्रिवेणी बहाई तो लोग संगीत की पावन धारा में डुबकी लगाकर अघाते रहे। ठुमरी दादरा और ख्याल गायन की मल्लिका मानी जाने वाली पद्मश्री शुभा मुद्गल अपने ही शहर में बज्म-ए-विरासत में मेहमान के रूप में आईं थीं। दिन के 11 बजे शहर के संगीत रसिकों से खचाखच भरे परिसर में वह जैसे ही मंचासीन हुईं, खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ लोगों ने उनका अभिवादन किया।

उन्होंने दादरा, ठुमरी की बंदिशों की बजाए महाप्राण निराला और महादेवी की कविताओं को रागों में निबद्ध किया। उन्होंने महाप्राण की कविता बांधों न नाव इस ठांव बंधु /पूछेगा सारा गांव बंधु... को जब स्वरों के जरिए साधा तो अद्भुत भावों का समागम हर किसी के लिए अविस्मरणीय बन गया। बीच से फरमाइश सावन के गीत की होती रही, लेकिन शुभा ने इसके बाद महादेवी की कविता फिर विकल हैं प्राण मेरे... पर रागों की अवतारणा की। उन्होंने महादेवी की पूरी कविता का गान किया।

विज्ञापन
विज्ञापन

बीच में बताती रहीं कि महादेवी से बचपन के उनके कई किस्से भी हैं, जिन्हें यहां सुनाने का वक्त नहीं है, लेकिन उन स्मृतियों को छोड़ पाना भी संभव नहीं लगता। इसके बाद 1975 में आपातकाल के दौर में लिखी विजयदेव नारायण शाही की गजल को स्वरों में बांधा। उनकी बेटी सुष्मिता भी उन पलों की साक्षी बनीं। बोल थे- जमीं की खाक फिर छानिए ...यहां कुछ थक के बैठे हैं/ जहां कहिए वहां जाएं...। उनके स्वरों में बज्में ही इसी शहर की गलियों से गुनगुनाती, झूमती, इतराती हुई गुजरती रहीं।

संगीत के इस कुंभ में डुबकी लगाने के लिए वहां पुराने गुणीजन भी थे और नई पीढ़ी भी स्वलहरियों में आशा की नई कोपलों को निहार रही थी। अंत में शुभा ने भजन के बोल अजर झरै रस गगन गुफा में....बिन बाजा झनकार उठे... की प्रस्तुति की। तबले पर अनीश प्रधान, हारमोनियम पर सुधीर और तानपूरे पर अंजना और वृंदा ने संगत की। फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया, रामचारी और जफर बख्त ने आभार प्रकाश किया।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें