फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बैरियर तोड़ उड़ान भरने के लिए तैयार हैं लड़कियां

Wed, 26 Aug 2015 01:52 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
विज्ञापन
विज्ञापन
इलाहाबाद। इन दिनों ऐसा विज्ञापन देखने और सुनने को भी मिल रहा है जिसमें लड़कियों को पढ़ाई के लिए बाहर न जाने की बात कही जा रही है। अभिभावकों को सुरक्षा का डर दिखाकर छात्राओं को जिले में ही पढ़ाई की सलाह दी जा रही है लेकिन संस्थानों का यह लड़कियों को लुभाने का हथकंडा मात्र है। सच्चाई इससे काफी ईतर है। डर और हिचक का बैरियर तोड़कर हजारों छात्राएं कॅरियर केलिए मेट्रो सीटिज ही नहीं विदेश की ओर रुख कर चुकी हैं।
विज्ञापन


वह और उनके अभिभावक इस निर्णय से संतुष्ट ही नहीं निश्चिंत भी हैं। ज्यादातर शिक्षण संस्थानों में छात्राओं के लिए विशेष इंतजाम होते हैं। केंद्रीय तथा अच्छे संस्थानों में छात्राओं के लिए रोजाना के समान से लेकर ईलाज तक हर सुविधा परिसर में उपलब्ध है। कॅरियर को लेकर छात्राओं की जागरूकता को देखते हुए कई संस्थान सिर्फ उनके लिए खुल गए हैं। इतना ही नहीं फैशन डिजाइनिंग, इंटीरियर डेकोरेशन, बुटिक समेत कई कोर्सेज भी उन्हें ध्यान में रखकर तैयार कि गए हैं। इनमें डिप्लोमा से लेकर परास्नातक, पीएचडी तक के कोर्सेज शामिल हैं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रवेश प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रोफेसर जगदम्बा सिंह का कहना है कि छात्राएं कई मामलों में छात्रों से बेहतर हैं। उन्हें अवसर मिलना चाहिए। अब भी सुरक्षा इतना बड़ा फैक्टर नहीं है कि उनका कॅरियर बाधित कर दिया जाए। सभी अच्छे संस्थान पास भीड़-भाड़ इलाके में हैं। इसके अलावा उनमें हॉस्टल की सुविधा है। लोग अपनी बच्चियों को बाहर भेज भी रहे हैं। विश्वविद्यालय के ही डीन सीडीसी प्रोफेसर असीम मुखर्जी का कहना है कि मेरी बेटी ने भी बाहर से पढ़ाई की है।
विज्ञापन


अकेले रहने से उनका आत्म विश्वास बढ़ता है। इसके अलावा प्रोफेशनल लाइफ की चुनौतियाें तथा दूसरों से मिलने वाली प्रतियोगिता से पार पाने में अधिक सक्षम होती हैं। अब तो हर संस्थान में छात्राओं के लिए विशेष इंतजाम होते हैं। इसलिए सुरक्षा के डर से उन्हें बाहर न भेजना उनके साथ अन्याय है। खुद का बिजनेस चला रहीं रंजना निगम की बेटी विशाखा नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेकभनोलार्जी (निफ्ट) में पढ़ाई कर रही हैं।

रंजना का कहना है कि वहां छात्र-छात्रा साथ में पढ़ते हैं। बाहर पढ़ाई से बच्चियों में आत्मविश्वास के साथ समझ भी विकसित होती है। माहौल खराब जरूर है लेकिन उन्हें शुरू से ही बताना चाहिए कि क्या गलत है और क्या सही। रंजना का कहना है कि लड़कों के साथ लड़कियों को भी बचपन से प्रेरित करना चाहिए कि कॅरियर के लिए उन्हें भी बाहर जाना होगा। इसके लिए उनमें संस्कार भी डालने चाहिए।

बंग्लुरू की अमिता बसु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कांग्निटिव साइंस में रिसर्च कर रही हैं। अमिता ने बताया कि रिसर्च के सिलसिले में उन्हें मुंबई, दिल्ली आदि जिलों में भी जाना पड़ा। कहना है कि खुद सही हैं तो लोग मदद करते हैं। अमिता आगे के रिसर्च के लिए विदेश जाना चाहती हैं। मध्य प्रदेश से आकर मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में रिसर्च कर रहीं नेहा चौधरी का भी यही अनुभव है। उनका कहना है कि माता-पिता ने भी हमेशा सपोर्ट किया।

जयपुर का वनस्थली विद्यापीठ। गांधी की प्रेरणा से छात्राओं के लिए स्थापित इस संस्थान में सैकड़ों कोर्सेज चलाए जाते हैं। वहां लड़कियों को प्लेन, ट्रेन चलाना, घुड़सवारी समेत सबकुछ सिखाया जाता है। दिल्ली में एनएफएस, एसएलआरआई, गुजरात में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल मैनेजमेंट आदि अन्य कई संस्थान हैं जहां छात्राओं के रहने आदि के विशेष इंतजाम हैं। प्रोफेसर जगदम्बा सिंह का कहना है कि हर बड़े शहर में छात्राओं के एक-दो प्रतिष्ठित कालेज हैं। रहने के लिए गर्ल्स हॉस्टल भी हैं।

यदि हॉस्टल में जगह नहीं है तब भी संस्थान के आसपास छात्राओं के लिए अनेकोें लॉज होते हैं। उनमें भी कालेजों के हॉस्टल जैसी सुरक्षा तथा पाबंदियां होती हैं। प्रोफेसर जगदम्बा का कहना है कि इसके बाद भी छात्राओं के लिए रहने की समस्या आती है। इस बारे में सरकार को पहल करनी होगी। सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उच्च शिक्षा के लिए बाहर निकली हर छात्रा को उसी संस्थान के हॉस्टल में जगह मिले।
विज्ञापन


0 सही और गलत का संस्कार बचपन से ही डालें
0 हॉस्टल न मिले तो इंस्टीट्यूट के पास लें कमरा
0 रहने से पहले लॉज के बारे में कर लें जानकारी
0 नियमों का करें पालन, रात में निकलने से बचें
0 स्थानीय रिश्तेदारों के फोन नंबर शिक्षक, सहेली से साझा करें
0 हर छोटी-छोटी बात अभिभावक से करें शेयर
0 किसी भी छोटी घटना को न करें इग्नोर
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें