इलाहाबाद हाईकोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 26 मई 2025 को जारी उप्र श्री बांके बिहारी जी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश को श्री बांके बिहारी जी और दो अन्य ने चुनौती दी है। याचिका में आरोप है कि इस अध्यादेश के माध्यम से सरकार बांके बिहारी मंदिर पर अप्रत्यक्ष रूप से कब्जा करने का प्रयास कर रही है।
हाईकोर्ट ने इसी तरह का एक मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के चलते सुनवाई टाल दी है। अगली सुनवाई अब 20 अगस्त को होगी। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ इस याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
मथुरा स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर के नियंत्रण के लिए लाए गए अध्यादेश के खिलाफ याचिका श्री बांके बिहारी जी और दो अन्य ज्ञानेंद्र गोस्वामी, रशिक गोस्वामी ने दाखिल की है। याचिका में सरकार की मंदिर को लेकर मंशा पर गंभीर संदेह जताया गया है।
याचियों का कहना है कि बांके बिहारी जी का मंदिर उनके सेवायतों का निजी है। इस पर उन्हीं का अधिकार है। सेवायत अपने निर्धारित समय पर भगवान की सेवा करते हैं और उनके पक्ष में सिविल कोर्ट का फैसला भी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि सरकार इस अध्यादेश के माध्यम से मंदिर में अपना नियंत्रण रखना चाह रही है और उनके अधिकारी इस अध्यादेश के जरिये नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं। यह अध्यादेश पूरी तरह से असंवैधानिक है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
बृहस्पतिवार को सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता एमसी चतुर्वेदी, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रामानंद पांडेय और स्थायी अधिवक्ता राजीव कुमार सिंह ने कोर्ट को बताया कि प्रदेश सरकार के 26 मई 2025 के अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी गई है और वहां इस पर सुनवाई चल रही है। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट में सुनवाई करना उचित नहीं है।
याची अधिवक्ता ने सरकार की दलील का जवाब देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए बिंदु और इस याचिका में लिए गए आधार अलग-अलग हैं। हालांकि, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की जानकारी मिलने के बाद मामले की सुनवाई फिलहाल टाल दी।