इलाहाबाद (ब्यूरो)। थोड़े से दबाव के आगे झुक जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन का इकबाल लंबे समय बाद दिखाई दिया। छात्रनेता, पूर्व छात्रसंघ पदाधिकारियों के अलावा सरकार और जिला प्रशासन का भी दबाव था, लेकिन विश्वविद्यालय के अफसर फैसले पर अडिग रहे और भारी विरोध के बीच समाजवादी छात्रसभा के दो प्रत्याशियाें समेत 11 के नामांकन रद्द कर दिए गए। कुलपति की अगुवाई में हुए इस फैसले और रुख का चौतरफा स्वागत हो रहा है तथा छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया से अफसरों में उत्साह है।
अधूरा फार्म भरने वाले समाजवादी छात्रसभा के प्रत्याशी अजीत यादव विधायक का नामांकन वैध कराने के लिए तीन दिनों तक गतिरोध बना रहा। सभा से जुड़े छात्रनेता ने कुलपति को धमकी तक दे डाली। इसके अलावा सरकार के हस्तक्षेप पर कमिश्नर ने भी अजीत का नामांकन रद्द होने पर शहर में बवाल की आशंका जता दी। इसके अलावा विश्वविद्यालय में शिक्षकों की सियासत भी कुलपति के साथ नहीं है। इस गतिरोध की वजह से एक बार तो यह भी अंदेशा हो गया था कि चुनाव नहीं हो पाएगा। इसके बावजूद कुलपति अपने फैसले पर अडिग रहे।
लिंगदोह समिति के अनुसार पूरा फार्म न भरने वालों का नामांकन रद्द करने के अलावा वह इस बात पर भी कायम रहे कि चुनाव निर्धारित समय पर ही होगा। उनके इस तेवर को देखते हुए विश्वविद्यालय में शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग उनके साथ खड़ा दिखाई दिया। इससे बने दबाव के बाद जिला प्रशासन के अलावा छात्र नेता भी बैकफुट पर दिखाई दिए और सबका मकसद अब सिर्फ शांतिपूवर्क चुनाव कराने पर केंद्रित हो गया है। विश्वविद्यालय में कुलपति तथा अन्य अफसरों से इस तरह के रुख की उम्मीद नहीं थी। 2012 के चुनाव का ही उदाहरण लें तो कई दागी उम्मीदवार मैदान में रहे लेकिन किसी का नामांकन रद्द नहीं हुआ। नतीजा हाईकोर्ट ने अध्यक्ष का निर्वाचन अवैध कर दिया।
इसके अलावा विश्वविद्यालय में कई ऐसे मौके आए जब विश्वविद्यालय में प्रशासन पूरी तरह से निष्प्रभावी रहा तथा परिसर धीरे-धीरे अराजकता का पर्याय बन गया। ऐसे में कुलपति के इस रुख की हर तरफ तारीफ हो रही है।