इलाहाबाद विश्वविद्यालय में रिसर्च पर सबसे अधिक ध्यान देने के दावे किए जाते रहे हैं। केंद्रीय दर्जा मिलने के बाद तो पूरा फोकस शिक्षकों की नियुक्ति और शोध कार्यक्रमों पर रहा, लेकिन इन दावों में कितना दम है इसका अनुमान नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। गौर करने वाली बात यह है कि इन मानकों पर विश्वविद्यालय अन्य संस्थानों से काफी पीछे रह गया। चौंकाने वाली बात यह है कि विगत तीन वर्षों में विश्वविद्यालय एक भी पेटेंट नहीं करा सका। हां, 2012 में एक रिसर्च को पेटेंट कराने के लिए आवेदन जरूर किया गया है। इसके विपरीत बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) कहीं आगे हैं।
एनआईआरएफ ने फैकेल्टी, विद्यार्थी, सुविधाएं, छात्र-छात्राआें के लिए कार्यक्रम, प्रकाशन, आईपीआर, शैक्षणिक गतिविधियों और परीक्षा के आधार पर शिक्षण संस्थानों की रैंकिंग निर्धारित की है। रैंकिंग के लिए सत्र 2012-13, 2013-14 और 2014-15 को आधार बनाया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय तकरीबन इन सभी मानकों पर प्रदेश के दो अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों बीएचयू और एएमयू से पीछे रह गया। आईपीआर की कसौटी पर देखें तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से 2012-13 में पेटेंट के लिए मात्र एक आवेदन हुआ है। उसे भी अभी मंजूरी नहीं मिली है।
इसके विपरीत बीएचयू ने इन तीन सत्रों में 15 आवेदन किए। इस दौरान 13 रिसर्च पेपर पेटेंट कराने में सफल भी रहा। वहीं एएमयू ने पेटेंट के लिए 35 आवेदन किए हैं। पांच पेटेंट कराने में सफल रहा। एएमयू ने पांच पेटेंट के माध्यम से 1.88 करोड़ रुपये अर्जित भी किए हैं। रिसर्च पेपर पब्लिकेशन के मामले में भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय पिछड़ गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के 2097 शोध रिपोर्ट अलग-अलग जरनल में प्रकाशित हुए। दूसरे संस्थानों के 7547 शोध कार्यक्रमों में इन्हें कोड किया गया। वहीं बीएचयू के 7356 रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए। खास यह कि 32225 शोध कार्यक्रमों में बीएचयू की रिपोर्ट को कोड किया गया या इस पर दूसरे संस्थानों ने भी शोध को आगे बढ़ाया। एएमयू में 4712 शोध प्रकाशित हुए और 22846 अन्य संस्थानों के प्रोजेक्ट में इन्हें कोड किया गया। फैकेल्टी के मामले में भी बीएचयू और एएमयू इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बहुत आगे हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुल 351 अध्यापक हैं। इनका कुल अनुभव 7913.92 साल का है। वहीं बीएचयू में 1136 अध्यापक हैं। इनका अनुभव 22047.75 वर्ष है। एएमयू में 737 अध्यापक हैं, जिनका अनुभव 14180.17 वर्ष है।
- इविवि की लाइब्रेरी में किताब और जरनल मंगाने पर तीन सत्र में 9.72 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वहीं 2.90 करोड़ रुपये ई-जरनल और ई-सोर्सेज पर खर्च किए गए। लैब अपग्रेडेशन पर 8.50 करोड़ तथा उपकरणों की मरम्मत पर 1.48 करोड़ रुपये खर्च हुए। इविवि में खेल पर 29.22 लाख तथा अन्य कार्यक्रमों पर 14.68 लाख रुपये खर्च हुए। वहीं बीएचयू की लाइब्रेरी में 2.82 करोड़ रुपये की किताबें तथा जरनल मंगाए गए। 13.69 करोड़ रुपये के ई-जरनल मंगाए गए। लैब के उच्चीकरण पर 113.79 करोड़ तथा मरम्मत पर 6.17 करोड़ रुपये खर्च हुए। खेल पर 3.41 तथा अन्य गतिविधियों पर 1.92 करोड़ रुपये खर्च हुए। एएमयू की लाइब्रेरी के लिए 10.10 करोड़ के पुस्तकें और जरनल मंगाए गए। हालांकि ई-जरनल मात्र 8.89 लाख रुपये के मंगाए गए। लैब के उच्चीकरण पर 85.51 करोड़ तथा मरम्मत पर 2.71 करोड़ रुपये खर्च हुए। खेल पर 2.53 करोड़ तथा अन्य गतिविधियों पर 88.12 लाख रुपये खर्च हुए।
असुविधाओं के बावजूद इविवि के छात्र-छात्रा आगे रहे। विभिन्न कार्यक्रमों में इविवि के नौ विद्यार्थी टॉप पर रहे। वहीं बीएचयू के तीन विद्यार्थी ही प्रथम स्थान पर रहे। हालांकि एएमयू के 21 विद्यार्थियों ने अलग-अलग कार्यक्रमों में पहला स्थान हासिल किया।
एनआईआरएफ की ओर से जारी इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थानों की सूची में ट्रिपलआईटी इलाहाबाद टॉप 100 में भी शामिल नहीं है। यह स्थिति संस्थान के शिक्षकों के लिए भी हैरान करने वाली है और इस रिपोर्ट से वे असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं। निदेशक प्रोफेसर सोमनाथ विश्वास का कहना है कि एनआईआरएफ की पूरी रिपोर्ट अभी तक नहीं देखी गई है, लेकिन इतना जरूर सामने आया है कि संस्थान में विगत तीन वर्षों का प्लेसमेंट शून्य दिखाया गया है। जबकि, इस दौरान संस्थान का प्लेसमेंट काफी अच्छा रहा। इससे यह लगता है कि डाटा भेजने या अपलोड होने में कहीं कोई चूक हुई। उन्होंने बताया कि एनआईआरएफ की पूरी रिपोर्ट का अध्ययन किया जा रहा है। इसके बाद संस्थान की ओर से एनआईआरएफ को पत्र लिखकर सभी पहलुओं की जांच कर संशोधित सूची जारी करने का अनुरोध किया जाएगा।
प्रदेश सरकार के पूर्व उच्च शिक्षामंत्री तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापक रहे डॉ.नरेंद्र कुमार सिंह गौर ने एनआईआरएफ की रैंकिंग में यूनिवर्सिटी के 68वें स्थान पर रहने पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि इस विश्वविद्यालय का गौरवशाली इतिहास रहा है, लेकिन शिक्षकों की कमी की वजह से पठन-पाठन पूरी तरह से अव्यवस्थित हो गया है। शैक्षणिक गुणवत्ता और रिसर्च तथा प्रशासनिक व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। उन्होंने कार्यपरिषद और विद्वत परिषद की तत्काल बैठक बुलाकर इसकी समीक्षा कराने की मांग की। उन्होंने पांच साल का लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़ने की बात कही।