इलाहाबाद। कभी संगमनगरी इलाहाबाद सहित पूरे देश को कला से लेकर कारोबार तक के क्षेत्र में अहम योगदान देने वाले पारसी समुदाय की पहचान अब धीरे-धीरे गुम होने को है। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या तकरीबन 57 हजार रह गई है तो उत्तर प्रदेश में भी सौ से कम और संगमनगरी में तो सिर्फ और सिर्फ सात पारसी ही बचे हैं।
देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध करने में पारसियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इलाहाबाद में कोई सौ बरस पहले बतौर कारोबारी ईरान के शापूजी गुजरात से होते हुए इलाहाबाद आए। यहीं उनका कुनबा पला और बढ़ा। यहां उन्होंने चांदी-सोना, आटोमोबाइल से लेकर शराब तक का कारोबार किया। गजधर और मोती शाह जैसे उनके कर्मचारी भी अपने अलग-अलग व्यवसायों से जुड़ गए। शापू जी के तीसरे बेटे केएस गांधी ने ही वर्ष 1924 में पैलेस सिनेमा का निर्माण कराया, जिसमें इंजीनियर डाली एडल्जी ने बतौर ऑपरेटर काम शुरू किया।
बदलती जीवन शैली का असर पारसियों पर भी पड़ा। कारोबार के सिलसिले में ज्यादातर युवा बाहर चले गए और बीते दिनों आधे से ज्यादा बुजुर्ग नहीं रहे। ऐसे में गिनती के पारसियों के बीच धार्मिक-पारंपरिक आयोजनों पर भी विराम लगा। तकरीबन 16-17 बरस पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के चचेरे भाई डॉ.यजद की ‘रिशेप्शन पार्टी’ में ही संभवत: अंतिम बार सामूहिक रूप से पारसी जुटे। फिर ऐसा कोई सामूहिक आयोजन नहीं हुआ। आज इलाहाबाद में सात पारसी ही बचे हैं।
इलाहाबाद पारसी जोरास्ट्रियन अंजुमन के अध्यक्ष रुस्तम गांधी कहते हैं, समाज की परिस्थितियां और मान्यताएं ही पारसियों की घटती संख्या की वजह हैं लेकिन धार्मिक प्रमुख रीति-रिवाजों में बदलाव को तैयार नहीं हैं। परिस्थितियों के मुताबिक अंतिम संस्कार से लेकर अन्य विषयों तक में थोड़े-बहुत बदलाव जरूर हुए हैं लेकिन कम होती संख्या का मुद्दा अब भी जस का तस है।
कई पुरस्कारों से सम्मानित शिक्षिका मेहर एफ ढोंडी बीते दिनों पति और देवर के साथ बेटे के पास गुड़गांव चली गईं तो डॉ.केएच भमगरा, डॉ.एच भमगरा, होमी पिरोशा डांडीवाला, शिरीन एच डांडीवाला, डीनाज मेहता आदि नहीं रहे। फिलहाल मूल पारसियों में इलाहाबाद में रुस्तम गांधी, शहरनाज गांधी, विंगकमांडर रोहिंटन बी.फ्रामजी, सायरस फ्रामजी, डीनशा फ्रामजी, वीरा डी गांधी, डेरायस डी गांधी ही रहते हैं। तीन परिवारों में पारसी-गैर पारसी मिलाकर तकरीबन 12-14 सदस्य ही हैं।
इलाहाबाद का अकेला फायर टेंपल ‘दार-ए-मेहर’ पुरोहित के भरोसे है। संभवत: यह प्रदेश का पहला फायर टेंपल है। इसे शापूजी गांधी ने 1929 में बनवाया था। यह ऐसा मंदिर है जहां 1929 से अखंड अग्नि जल रही है। इसके भीतर पुरोहित के अलावा किसी अन्य को जाने की अनुमति नहीं है। फिलहाल पैलेस सिनेमा की मालकिन वीरा डी गांधी और उनके बेटे डेरायस डी गाँधी इसकी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। पुरोहित केजे हिल्लो के मुताबिक अखंड अग्नि के लिए प्रति माह चार कुंतल लकड़ियां लगती हैं।
डॉ.बी हिरजी ने डेंटिस्ट, जेएम पटेल ने फोटोग्राफी, प्रोफेसर जमशेद ने अर्थशास्त्र, फिरोज एडल्जी दस्तूर ने शिक्षा, सावक नानावती ने दवा कारोबार (कोहिनूर केमिस्ट के संस्थापक ), फरदुन ढोंडी ने सिंगर सिलाई मशीन, वेजन एफ ढोंडी ने टेलरिंग के क्षेत्र में अपनी जगह बनाई। वहीं राजनीतिक क्षेत्र में फिरोज गांधी ने पहचान बनाई जबकि उनकी बहन तेमिना गांधी महिला इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल बनीं। फिरोज के बड़े भाई फरेदुन गांधी हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट थे। उनकी पत्नी रोडा गांधी ने होटल फिनेरो और पटेल ने शहर को रॉयल होटल दिया।
पारसी समुदाय में किसी अन्य जाति या धर्म से शादी मान्य नहीं है। शिक्षा और कारोबार समाज की प्राथमिकता रही है, ऐसे में बाहर गए युवक-युवतियों ने समुदाय में योग्य साथी न मिलने पर अपनी स्टेटस और पसंद के मुताबिक अन्य समुदायों में शादी कर ली लेकिन ‘इंटर कम्युनिटी मैरिज’ करते ही उन्हें समुदाय ने अपने से बाहर कर दिया। ऐसे में एक सदस्य तो कम हुआ ही, उनकी संतान को भी तब तक पारसी नहीं माना जाएगा जब तक कि उसकी ‘नवजोत’ न हो जाए यानी पारंपरिक अनुष्ठान के बिना वह बच्चा पारसी नहीं कहलाएगा।