करनाईपुर क्षेत्र के सातनपुर में भेड़ चराते भेड़ पालक
समय के साथ भेड़ पालकों की आमदनी कम हो गई है। पहले 60 से 65 रुपये में खरीदा जाने वाला ऊन अब 35 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। ऐसे में लोगों इस व्यवसाय से किनारा करने लगे हैं।
खेतों और खाली मैदानों में भेड़ों को चराते भेड़ पालकों की तस्वीरें आज भी ग्रामीण जीवन की पहचान हैं लेकिन इसके पीछे छिपा सच चिंता बढ़ाने वाला है। क्षेत्र में भेड़ों के ऊन के दाम में भारी गिरावट आने से भेड़ पालकों की आमदनी लगातार कम होती जा रही है।
बहरिया में भेड़ पालन करने वाले किसानों से भदोही के व्यापारी आकर ऊन कटवाते थे और 60–65 रुपये प्रति किलो तक कीमत देते थे। वर्तमान समय में उन्हें ऊन कटवाने के लिए करीब 35 रुपये प्रति किलो ही मिल रहा है।
बहरिया के धमौर गांव निवासी छेदीलाल पाल बताते हैं कि पहले गांव में भेड़ पालकों की संख्या काफी अधिक थी लेकिन अब लोग यह काम छोड़ रहे हैं। उनके पास वर्तमान में लगभग 50 भेड़ हैं, जिन्हें चराने के लिए दूर-दराज के खेतों और मैदानों तक जाना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि करीब दस साल पहले एक भेड़ की कीमत लगभग 6000 तक थी, जो अब घटकर करीब 4000 रह गई है। सुबह से शाम तक खेतों में भटकते हैं, लेकिन आमदनी लगातार घट रही है। भेड़ पालकों ने सरकार से ऊन और भेड़ों के दाम बढ़ाने तथा भेड़ पालन को प्रोत्साहन देने की मांग की है।