बृहस्पतिवार की रात 9:30 बजे कार्तिक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी लग गई। महालक्ष्मी के आगमन पर घरों से लेकर प्रतिष्ठानों तक कुबेर, लक्ष्मी की प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना कर देर रात कर मंत्रोच्चार के साथ पूजा की गई। महिलाओं ने तरह-तरह की रंगोलियां सजाईं। चावल आटे से महालक्ष्मी के पदचिह्नों की छाप बनाई गई। रंग-बिरंगी झालरों और फूलों के वंदनवारों से घरों और प्रतिष्ठानों को सजाया गया।
प्रदोषकाल में त्रयोदशी न होने से धनतेरस की मान्यता शुक्रवार को भी रहेगी। धनतेरस पर शुक्रवार की दोपहर अभिजीत मुहूर्त में भी कुबेर और महालक्ष्मी की पूजा की जाएगी। इसके साथ पंचदीप महापर्व शुरू हो गया है। शुक्रवार को अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति के लिए यम केदीप भी जलाए जाएंगे। इसके बाद इस बार 14 नवंबर को नरक चतुर्दशी और दिवाली एक साथ पड़ेगी। अन्नकूट और गोवर्धन पूजा रविवार को होगी। फिर,16 नवंबर को यम द्वितीया, भैया दूज और चित्रगुप्त पूजा की जाएगी।
गोवत्स द्वादशी पर गाय-बछड़े की पूजा
गोवत्स द्वादशी पर बृहस्पतिवार को गाय-बछड़े की पूजा की गई। इस दौरान गोशालाओं में गायों को हल्दी-अक्षत के टीके लगाए गए। तरह-तरह के पकवान और मिठाई भी गवंशों को खिलाई गई। झूंसी , शंकरगढ़ के अलावा अन्य इलाकों में गोशालाओं में गोवत्स द्वादशी मनाई गई।