चाहे प्रयाग संगीत समिति हो या आकाशवाणी इलाहाबाद, जानेमाने तबला वादक प्रोफेसर लालजी श्रीवास्तव का घर-आंगन हो या एमएनएनआईटी के प्रेक्षागृह जैसा कोई मंच, प्रख्यात शास्त्रीय गायिका पद्मविभूषण गिरिजादेवी की यादें संगमनगरी के तमाम मंचों पर मौजूद हैं। उनकी सांसें भले ही थम गई हैं लेकिन तमाम संगमनगरी के संगीत प्रेमियों सहित उनके शिष्यों, आत्मीयजनों की स्मृतियों में ‘अप्पा’ हमेशा जिंदा रहेंगी।
संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित आचार्य गिरीश चंद्र श्रीवास्तव कहते हैं, वह इलाहाबाद दो-तीन बार नहीं बल्कि साठ के दशक में तो वर्ष में कम से कम दस बार आती थीं। वह मेरे गुुरु और संगीत समिति के तत्कालीन निदेशक प्रोफेसर लालजी श्रीवास्तव की मुंहबोली बहन थी। शुरुआत में वह लोकनाथ स्थित एक होटल में रुकी थीं तो गुरुजी ने उनसे घर चलने का आग्रह किया। इसके बाद तो वह पति और अपनी पूरी टीम के साथ जब भी आतीं, वहीं रुकतीं।
उनसे कहतीं, भैया जी, आज सुलाकी की बालूशाही और रात की मलाई हो जाए। फिर क्या उनके लिए ये चीजें आतीं और वह उसे चाव से खाती थीं। यहां उनका इतना सम्मान था कि उनके लिए लहसुन-प्याज के साथ कटहल की सब्जी बनती, जबकि उनके पति मधुसूदन जैन के लिए बिना लहसुन-प्याज सब्जी बनती। गुरुजी के छोटे भाई चंद्रभान किशोर की शादी में वह आईं तो परिवार की महिलाओं के साथ बन्ना-बन्नी सहित शादी के तमाम गीत सुनाए। जाते समय बेटी की तरह ही उनकी विदाई हुई थी। मेरी शादी में भी आईं तो मुंहदिखाई में पत्नी को अपनी पसंद की साड़ी और अन्य उपहार दिए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ओर से साठ के दशक में लक्ष्मी टॉकीज के प्रेक्षागृह में एक संगीत सम्मेलन हुआ था जिसमें उन्होंने पंडित अनोखेलाल के तबला वादन के साथ राग जोग में जो रचना सुनाई, उसे कोई नहीं भूल सकता।
प्रयाग संगीत समिति के सचिव अरुण कुमार कहते हैं, संगीत समिति के लिए उनके मन में अपार स्नेह था। समिति के एक कार्यक्रम में वह 1999 में आईं थी तो उनका गायन सुनने के लिए दूसरे जिलों से भी लोग जुटे थे। इसके बाद वर्ष 2003 में समिति ने उन्हें ‘संगीत महोदति’ सम्मान से नवाजा था लेकिन इस बार उन्होंने कोई कार्यक्रम नहीं प्रस्तुत किया था। शिक्षिका उमा दीक्षित कहती हैं, समिति के विद्यार्थियों का हौसला बढ़ाते हुए उन्होंने कहा था, हां, तुम भी मेरी तरह गा सकते हो।
आकाशवाणी इलाहाबाद के कार्यक्रम प्रमुख मंजुल किशोर वर्मा कहते हैं, यह केंद्र का सौभाग्य है कि गिरिजादेवी की स्वर परीक्षा यहीं हुई। वह यहां के कार्यक्रमों से निरंतर जुड़ी रहीं। वर्ष 1949 में उन्होंने आधिकारिक तौर पर पहली प्रस्तुति यहीं दी थी।
स्पिक मैके की प्रदेश कोआर्डिनेटर डॉ.मधु शुक्ला कहती हैं, अंतिम बार वह 31मार्च 2014 को स्पिक मैके की विरासत शृंखला में शामिल होने एमएनएनआईटी आई थीं। अस्वस्थता के बावजूद जब उन्होंने दादरा सुनाया, ‘दीवाना किए श्याम क्या जादू डाला’ तो हर कोई बस मंत्रमुग्ध हो सुनता रहा। समिति के विद्यार्थियों से मुलाकात में उन्होंने संगीत की बारीकियां सिखाने के साथ उनका हौसला भी बढ़ाया था। उनकी कमी हमेशा खलेगी।
पद्मविभूषण गिरिजादेवी की स्मृति में प्रयाग संगीत समिति में दो मिनट का मौन रखने के बाद समिति बंद कर दी गई। सचिव अरुण कुमार की अध्यक्षता में हुई सभा में समिति की शिक्षक-शिक्षिकाएं, छात्र-छात्राएं मौजूद थीं।