इससे पूर्व मुख्य अतिथि प्रो. अजय कुमार सूद एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. गोविंद राजन पद्मनाभन, आईआईटी मुंबई के प्रो. जयेश आर. बेलारे आदि ने दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। उद्घाटन सत्र के बाद वैज्ञानिकों ने अपने शोधपत्र भी पढ़े। खाद्य सुरक्षा एवं स्वास्थ्य देखभाल पर आधारित प्रो. अशोक कुमार सिंह एवं प्रो. अश्विनी पारीक के व्याख्यान से श्रोताओं को विस्तृत जानकारी मिली।
आईसीएमआर के महानिदेशक प्रो. बलराम भार्गव की अध्यक्षता एवं प्रो. निखिल टंडन की सह अध्यक्षता में प्रो. अमित घोष का एंटीबायोटिक पर एवं प्रो. शिव शारिन का फैटी लिवर पर व्याख्यान जनोपयोगी रहा। अतिथियों का स्वागत नासी के कार्यकारी सचिव डॉ. नीरज कुमार और धन्यवाद ज्ञापन साइंस फैकल्टी बीएचयू की डीन प्रो. मधुलिका अग्रवाल ने किया।
कंप्यूटर और लैपटॉप के अत्यधिक प्रयोग से बचें
शिक्षकों को विज्ञान शिक्षण में पारंगत बनाने के लिए प्रयोगशाला का अधिक से अधिक उपयोग होना चाहिए। साथ ही कंप्यूटर और लैपटॉप के अत्यधिक प्रयोग से बचना चाहिए। यह बात नासी के 92वें वार्षिक अधिवेशन में शामिल होने आए भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलौर के पूर्व निदेशक पद्म भूषण प्रो. गोविंद राजन पद्मनाभन ने कही।
उन्होंने कहा कि विज्ञान एवं तकनीकी से सामाजिक क्रांति तभी लाई जा सकती है, जब इसको प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कृषि के क्षेत्र में विज्ञान का समुचित और सही उपयोग किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय वैज्ञानिकों को पोस्ट कोविड प्रभावों की किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के लिए आत्मनिर्भर रहना चाहिए, न कि विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना चाहिए।
प्रो. पद्मनाभन ने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमें दवाओं के विकल्प पर जोर देना चाहिए, क्योंकि भारत की तकरीबन 70 फीसदी आबादी अब भी एलोपैथिक दवाओं के विकल्पों से अंजना है। उन्होंने कृषि के क्षेत्र में जनसंख्या के अनुपात में फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए अनुवांशिक रूप से रूपांतरित जीनोम तकनीक को बढ़ावा देने पर जोर दिया।