सरकार ने कहा छात्रों ने तोड़ा था गेट, सात जनवरी को अगली सुनवाई
प्रयागराज। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में छात्र आंदोलन में पुलिस उत्पीड़न को लेकर दाखिल जनहित याचिकाओं पर अब सात जनवरी को सुनवाई होगी। बृहस्पतिवार को राज्य सरकार की तरफ से इस मामले में हलफनामा दाखिल कर कोर्ट को बताया गया कि छात्रों ने स्वयं ही विश्वविद्यालय का गेट तोड़ा था और परिसर में पुलिस विश्वविद्यालय प्रशासन के बुलाने पर गई थी। परिसर में पुलिस ने कोई फायरिंग नहीं की और न ही आवश्यकता से अधिक बल का प्रयोग किया। सरकार की तरफ से घटना के समय की सीसीटीवी फुटेज भी सीडी के माध्यम से कोर्ट में दाखिल की गई।
याचिका की सुनवाई कर रही इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर तथा न्यायमूर्ति विवेक वर्मा की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अगली सुनवाई के लिए सात जनवरी की तिथि नियत की है। इस दिन निर्णय सुनाए जाने की उम्मीद है। याची मोहम्मद अमन खान ने पुलिस उत्पीड़न की जांच हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से कराने की मांग की है। राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने बताया कि विश्वविद्यालय के छात्रों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचने का इंतजाम किया गया। यहां तक कि कश्मीर से आने वाले छात्रों को बसों और ट्रेनों के जरिए उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाया गया। किसी भी छात्र के लापता होने की कोई सूचना नहीं है।
पुलिस विश्वविद्यालय प्रशासन के बुलाने पर परिसर में गई थी। आंदोलनरत छात्रों को नियंत्रित करने के लिए जरूरी होने के कारण ही ऐसा किया गया । उग्र छात्रों ने पुलिस पर पथराव कर तोड़फोड़ की थी। उन्होंने ही विश्वविद्यालय का मुख्य गेट तोड़ दिया था। पुलिस ने न्यूनतम बल का प्रयोग करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोग से परिसर को खाली कराया। इस आंदोलन में पथराव करने वाले गिरफ्तार 26 लोगों में से केवल 12 ही छात्र पाए गए हैं। शेष बाहरी तत्व हैं, जिन्होंने छात्र आंदोलन को हिंसक रूप देने में मदद की। इसी के साथ संबद्ध एक अन्य याचिका में घटना की जांच रिटायर्ड पुलिस अधिकारी से कराने की मांग की गई है। तीन अधिकारियोें के नाम भी सुझाए गए हैं।