इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक बार परिवाद शुरू हो गया तो उसमें संशोधन के लिए पर्याप्त कारण होने चाहिए। इसके साथ ही संशोधन की अनुमति उतनी ही दी जा सकती है, जिससे कि वाद की प्रकृति में बदलाव न आए। अगर ऐसा होता है तो वाद में संशोधन की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
संशोधन की अनुमति के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश छह की धारा 17 के अंतर्गत पर्याप्त कारण होना जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने एके दूबे व अन्य की ओर से दाखिल याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
मामले में याची की ओर से निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई थी। याची ने निचली अदालत में वाद दायर कर लीज समझौता के समाप्त होने के बाद एक्साइड इंडस्ट्रीज लिमिटेड को अपने व्यावसायिक परिसर को खाली करने के लिए वाद दायर किया है। वाद पर सुनवाई के दौरान याची ने वाद में संशोधन के लिए अर्जी दाखिल कर प्रतिदिन दो हजार रुपये हर्जाने के भुगतान की मांग की।
लेकिन, निचली अदालत ने संशोधन अर्जी को पर्याप्त आधार न पाते हुए खारिज कर दिया। याची ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही बताते हुए संशोधन अर्जी को खारिज कर दिया।
मामले में गोरखपुर के एके दूबे व एक्साइड इंडस्ट्रीज लिमिटेड के बीच उनके देवरिया बाईपास स्थित व्यावसायिक स्थल के प्रयोग के लिए पांच साल का करार हुआ था। करार खत्म होने के बाद जब प्रतिवादी ने स्थल खाली नहीं किया तो याची ने निचली अदालत में वाद दाखिल किया था।