विश्वविद्यालय कोरोना जांच के लिए यह मशीन कुछ दिनों के लिए मेडिकल कॉलेज को देने के लिए तैयार है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग ने यह मशीन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रोजेक्ट डिपार्टमेंटल रिसर्च सपोर्ट (डीआरएस) के तहत खरीदी थी। इस प्रोजेक्ट के लिए वर्ष 2014 में यूजीसी से 23 लाख रुपये मिले थे, जिससे दो उपकरण खरीदे गए थे।
अमेरिकी कंपनी बायो रैड की ओर से बनाई गई इस मशीन की कीमत उस वक्त 12 लाख रुपये के आसपास थी। तकरीबन एक साल तक इस मशीन पर शोधर्थियों ने काम किया। शोध पूरा होने के बाद कुछ छात्र विदेश चले गए और फिर इस मशीन का उपयोग नहीं हुआ। जंतु विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. आरएस पांडेय ने बताया कि पिछले साल तक इस मशीन की देखरेख की जिम्मेदारी उनके शोधार्थी डॉ. ऋषिकेश तिवारी के पास थी। डॉ. ऋषिकेश का शोध पूरा हो चुका है और वह भदोही में हैं।
मशीन ठीक से काम कर रही है या नहीं, इसे देखना पड़ेगा। प्रो. आरएस पांडेय का कहना है कि इसी मशीन से कोरोना वायरस की जांच होती है लेकिन इसके लिए जिस केमिकल का उपयोग होता है, वह काफी महंगा है। विश्वविद्यालय में कोरोना की जांच संभव नहीं है। इसके लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग की जरूरत पड़ेगी। अगर मेडिकल कॉलेज इस मशीन की मांग करता है तो विश्वविद्यालय की ओर से कुछ दिनों के लिए मशीन उपलब्ध कराई जा सकती है।