‘सखि बसंत आया, भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया, लता-मुकुल-हार-गंध-भार भर, बही पवन बंद मंद मंदतर’। महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की लिखी इस कविता में वसंत का जितना अद्भुत वर्णन है, वह कहीं और नहीं मिलता। शायद इसीलिए वसंत और निराला को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है। महाप्राण में अपनी रचनाओं में प्रकृति की नवीनता को जिंदगी की नवीनता के साथ जिस तरह जोड़ा है वह बेजोड़ है। उनकी रचनाएं मन को वासंतिक रंग में रंगकर निराशा से बाहर निकालती हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र कुमार ने बताया कि वसंत नवीनता का प्रतीक है। जिस तरह वसंत में नई पत्तियां, नई कोपलें, कई कलियां चटकती हैं उसी तरह निराला भी अपने को नवीनता से जोड़ते थे। छंद, भाषा, तथ्य में हमेशा नयापन लाते थे। उन्होंने कविता के पारंपरिक रूप का रूपांतरण किया। नयेपन का स्वागत उन्होंने जिस तरह से अपनी रचनाओं में किया है वह कहीं और दुर्लभ है। निराला की रचनाएं यह सीख देती हैं कि जिस तरह से वसंत में प्रकृति अपने नये रूप में आती है और मन प्रफुल्लित होता है, उसी तरह हमें अपनी जिंदगी में भी आने वाले बदलावों का स्वागत करना चाहिए।
वरिष्ठ कवि यश मालवीय ने बताया कि वसंत, निराला और इलाहाबाद को अलग करके नहीं देखा जा सकता। महाकवि की रचनाआें में तो वसंत रेशा-रेशा बसा हुआ है। वसंत को अपनी रचनाओं के जरिए नये रूप और आयाम दिए। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पौत्र डॉ. अमरेश त्रिपाठी ने कहा कि निरालाजी प्रेम और सौंदर्य के कवि थे। उनकी रचनाएं किताबों में बंद होने वाली रचना नहीं है। उनकी रचना ‘अभी-अभी आया है मेरे जीवन में मृदुल बसंत, अभी नहीं होगा मेरा अंत’ से ही पता चलता है कि वसंत उनके अंदर कितना रचना बसा था। निराला कविता लिखते ही नहीं बल्कि उसे जीते थे, तभी उनकी रचनाएं इतनी जीवंत हैं।