अदालतों में जमा होने वाली कोर्ट फीस और स्टांप शुल्क से राज्य सरकार को हर वर्ष होने वाली करोड़ों रुपये की आय को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें सरकारों की कमाई का जरिया नहीं हैं। सरकार को यहां से जितना राजस्व प्रतिवर्ष मिलता है उसका आधा भी अदालतों पर खर्च नहीं किया जा रहा है, जबकि कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाने की मांग करने पर सरकार राजकोष पर वित्तीय भार बढ़ने की दलील देती है। कोर्ट ने कहा कि सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह अदालतों को आवश्यक खर्च और मूलभूत सुविधाओं के लिए जरूरी धनराशि उपलब्ध कराए।
आर्थिक बोझ का हवाला देकर वेतन वृद्धि नियमावली का अनुमोदन करने से सरकार इंकार नहीं कर सकती है।
मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल ने कहा कि पिछले पांच वर्ष के आंकड़ों को देखा जाए तो सरकार को अदालतों से करोड़ों की धनराशि प्राप्त हुई है, जिसका आधा भी अदालतों केे लिए खर्च नहीं किया गया है। इसमें जुर्माने और हर्जाने की राशि तथा कोर्ट परिसर की दुकानों से मिलने वाला किराया शामिल नहीं है। सरकार को निर्देश दिया है कि वह हाईकोर्ट अधिकारी-कर्मचारी (आचरण एवं सेवा शर्त संशोधन) नियमावली 2005 को छह सप्ताह में अनुमोदन प्रदान करे। राज्य सरकार ने मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रस्तावित नियमावली 2005 को मंजूरी देने से इंकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संघ के महामंत्री मनबोध यादव ने इसे लेकर याचिका दाखिल की है। बताया गया कि पिछले पांच वर्षों के दौरान कोर्ट फीस और स्टांप ड्यूूटी के रूप में 13472.37 करोड़ रुपये की आमदनी हुई है। जबकि सरकार ने अदालतों पर 7668.94 करोड़ रुपये ही खर्च किए हैं। सरकार को 5803.43 करोड़ रुपये की बचत हुई है। कोर्ट ने कहा कि अदालतों से इतनी अधिक आमदनी होने के बावजूद आज तक उनकी दशा को सुधारा नहीं जा सका है।