यह हैरत की बात लेकिन सच है कि पूरे वर्ष गंगा के मुद्दे पर खामोश रहने वाले संत-महात्मा माघ मेले की दस्तक के साथ ही गंगा को लेकर जागरूक हो जाते हैं। बीते एक दशक के दौरान गंगा के नाम पर सभा, गोष्ठियों, सेमिनार आदि के अतिरिक्त मानव शृंखला, अनशन, उपवास, तपस्या, जलसमाधि जैसी गतिविधियां होती रहीं लेकिन मेले की समाप्ति के साथ ही ये मुद्दे भी अगले वर्ष तक के लिए मुल्तवी हो गए।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि छिटपुट प्रयासों को छोड़ दें तो अब तक संतों के गंगा आंदोलन कोरी बयानबाजी ही साबित हुए हैं। गंगा की अविरलता-निर्मलता को लेकर बड़े-बडे़ दावे, घोषणाएं की गईं लेकिन मेला बीतने के साथ ही मुद्दे भी गंगा में बह गए। गंगा को लेकर टीकरमाफी आश्रम के स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी, काशीसुमेरू पीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, स्वामी चिदात्मन, स्वामी आनंद गिरि, स्वामी महेशाश्रम, स्वामी विमलदेवाश्रम सहित अनेक संतों की ओर से अलग-अलग तरह की मुहिम चलाई गई लेकिन गंगा की निर्मलता के नाम पर परिणाम शून्य ही रहा।
स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी ने गंगा के लिए अनशन से लेकर अदालत तक का दरवाजा खटखटाया। अखिल भारतीय दंडी प्रबंधन समिति के पदाधिकारियों की ओर से कई वर्षों से मेले के पहले गंगा केनाम पर आंदोलन किए गए लेकिन कुछ मांगों और आश्वासनों के बाद मामला अगले वर्ष तक के लिए स्थगित हो गया। आरोप है कि आंदोलन सिर्फ प्रशासन से सुविधाएं बढ़ाने के नाम तक ही सीमित रह गया।
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से अविरल-निर्मल गंगा के नाम पर वर्ष 2007 में गंगा सेवा अभियानम की स्थापना की गई लेकिन तकरीबन एक दशक के दौरान गंगा के नाम सिर्फ वायदे, घोषणाएं ही रहीं। संसद और सांसदों की तर्ज पर पहले काशी में गंगा संसद का गठन और फिर प्रयाग सहित गंगा के किनारे बसे शहरों में गंगा सेवांसद और गंगाधायक बनाए गए।
गंगा सेवा अभियानम की ओर से गंगा के नाम पर कलेक्ट्रेट पर सत्तर दिनों के अनशन से हुई शुरुआत के बाद संगम से सिविल लाइंस तक मानव शृंखला बनाई गई। दूसरी मुहिम ‘कुछ कदम गंगा के साथ’ के तहत संगम से शृंगवेरपुर तक की यात्रा के दौरान गंगाजल के कई सैंपल लिए गए और जांच केबाद रसूलाबाद घाट के पांच नालों का बायोरेमिडेशन तकनीक से ट्रीटमेंट कराया गया, लेकिन जल्द ही यह कोशिश भी सुस्त पड़ गई।
इसी तरह वर्ष 2012 के माघ मेले में गंगा सेवा अभियानम की ओर से गंगा तपस्या शुरू की गई जो बाद में हरिद्वार और काशी में भी जारी रही लेकिन गंगा के नाम कुछ भी सार्थक नहीं रहा। अबकी मेले की शुरुआत के साथ एक बार फिर संगम की रेती से गंगा की अविरलता को लेकर मुहिम की बात है, जिसका परिणाम वक्त बताएगा। वहीं गंगा सेना की ओर से स्वामी आनंद गिरि की देखरेख में भी मानव शृंखला से लेकर सभा, संकल्प, गोष्ठी जैसे कई कार्यक्रम हुए लेकिन गंगा मैली और झोली खाली ही रही। सच्चे संकल्प के बिना गंगा के नाम पर बनी योजनाओं के बेमानी होने का सिलसिला जारी है।
गंगा सेवा अभियानम की ओर से 14 जनवरी से गंगा मुद्दे पर फिर गरमाने की योजना है। रणनीति के तहत मेले के दौरान पर्यावरणविदों की मौजूदगी में गोष्ठी के अतिरिक्त तीर्थयात्रियों को जागरूक करने सहित हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। मौनी अमावस्या स्नान के बाद देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत होगी।
अभियानम के संयोजक स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कहना है कि केंद्र सरकार की नमामि गंगे योजना ने निराश ही किया है। सरकार नदी के आसपास के वातावरण को बतौर पिकनिक स्पॉट विकसित करने पर ही जोर दे रही है जबकि गंगा को प्रदूषणमुक्त करने के लिए उसकी अविरलता जरूरी है। इस बावत पीएम मोदी को पत्र भी भेजा गया था लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।