राष्ट्रीय पुस्तक मेले के नौवें दिन शनिवार को अब्दुल कलाम को समर्पित कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न जिलों से आए रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में माध्यम से समाज की संगतियों और विसंगतियों पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि अपर महानिरीक्षक निबंधन एवं स्टांप प्रदीप कुमार ने कहा कि विषम परिस्थितियों में समाज एवं राष्ट्र को रचनाकार ही दिशा बोध करा सकता है।
नरेंद्र सिंह की कविता ‘सियासत हिंदू-मुस्लिम की जलाकर राख कर देना- तिरंगे बचा लेना मुझे तुम चाक कर देना’, अमित जौनपुरी की रचना ‘नर्सिंग होमों की दशा देख दिया दिल रोय, लाश तब मिल पाएगी जब बिल चुकता होय’ को खूब पसंद किया गया। शैलेंद्र मधुर ने ‘छोड़िये फिरका परस्ती आप तो इंसान हैं, गांव सूबे और कस्बे, आप हिंदुस्तान हैं’ और संजय पुरुषार्थी ने ‘उड़ते हुए पक्षी को न निशाना बनाइये, आकाश को धरती पे यूं तो न लाइये’ ने श्रोताओं को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। गीता सिंह, नजर इलाहाबादी, श्रीरंग, रतीनाथ योगेश्वर ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। धन्यवाद ज्ञापन उमेश ढल और स्वागत देवराज अरोरा ने किया।
राष्ट्रीय मेले में वाणी प्रकाशन की ओर से भगवान दास मोरवाल की किताब ‘हलाला’ और प्रो. हेरंब चतुर्वेदी के दो उपन्यास ‘मुगल शहजादा खुसरू’ और ‘दो सुल्तान दो बादशाह और उनका प्रणय परिवेश’ का विमोचन किया गया। प्रो. वाईपी सिंह ने प्रो. चतुर्वेदी की पुस्तकों को ऐतिहासिक दस्तावेज बताया। धनंजय चोपड़ा ने खुसरू को इलाहाबाद की पहचान बताया। वहीं प्रो. बद्रीनारायण ने हलाला को अपने समय का सामाजिक आख्यान बताया, कहा कि इस कृति में मेवाती समाज के बहाने स्त्री शोषण को बेहतर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस मौके पर दोनों लेखकों ने भी अपनी रचनाओं के संबंध में बातें रखीं। संचालन वाणी प्रकाशन के अरुण महेश्वरी ने किया। प्रो. अनीता गोपेश, डॉ. सुनीता द्विवेदी, प्रो. अनामिका चतुर्वेदी आदि मौजूद रहे।