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चालीस साल से बना रहे थे मंझा, चार साल से बंद था धंधा

Thu, 19 Nov 2015 12:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद(ब्यूरो)। चाइनीज मंझा आने के बाद पिछले 35-40 साल से धागे से मंझा बनाने वालों का काम करीब चार साल से बंद था। इन कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ तो परिवार का गुजारा चलाने के लिए कोई रिक्शा, ठेला चलाने लगा तो कुछ कारीगरों ने पान-चाय की दुकान खोल ली। ‘अमर उजाला’ के मुहिम के बाद बाजार से चाइनीज मंझा गायब होने और पतंग का सीजन शुरू होने पर धागे वाले मंझे की डिमांड बढ़ गई।
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इसके बाद पतंग-मंझे के कारोबारियों को भी उन कारीगरों की याद आ गई सो पिछले 15-20 दिनों में इन कारीगरों के पास मंझे के आर्डर की भरमार हो गई। जीरो रोड पर मोती पार्क के पास मंझा बनाने वाले अजीत, रामबाग में ईदगाह के त्रिलोकी नाथ तथा अकबरपुर में मनोहर दास बगिया के जीशान एवं रमजान अली के पास धागे वाले मंझे के आर्डर की भरमार हो गई है। उन्होंने चाइनीज मंझे के खिलाफ मुहिम का शुक्रिया अदा करते कहा कि अमर उजाला ने उनका धंधा फिर से जीवित कर दिया।

 चाइनीज मंझे के साथ शहर के लोग चाइना के हर उत्पाद पर प्रतिबंध की मांग करने लगे हैं। इसके साथ पॉलीथिन पर भी सख्ती से रोक लगाने की मांग की जा रही है। समाजसेवी मोहम्मद याशिर एवं अटाला व्यापार मंडल के अध्यक्ष फय्याज अहमद कुरैशी का कहना है कि जो लोग चोरी-छिपे चाइनीज मंझा बेच रहे हैं, पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाले। उनका कहना है कि लोगों को चाइनीज उत्पादों का पूरी तरह बहिष्कार करना चाहिए। ग्राहक और दुकान पॉलीथिन का प्रयोग भी बंद करें, ताकि प्रदूषण की समस्या खत्म हो। मिट्टी और दुधारू मवेशियों को बचाया जा सके।
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