वकीलों की ओर से एक ही मुकदमे में कभी एक तो कभी दूसरे पक्ष की पैरवी करने के संबंध में शीर्ष अदालत की टिप्पणी से कानून के जानकार सहमत हैं। न्यायविदें का मानना है कि ऐसा करना व्यावसायिक सिद्धांत और मर्यादा के विपरीत आचरण है। एडवोकेट्स एक्ट भी इसकी इजाजत नहीं देता है। वकीलों को ऐसा करने से रोकने के लिए पहले से नियम बनाए गए हैं तथा जो कोई भी इसके विपरीत आचरण करता है उसके विरुद्ध कार्रवाई करने का बार काउंसिल ऑफ इंडिया को अधिकार है। गौर तलब है कि सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने वकीलों के दोनों पक्षों से मुकदमे की पैरवी करने को काफी गंभीरता से लेते हुए बीसीआई और अटार्नी जनरल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन से भी इस मुद्दे पर सहायता मांगी है।
बीसीआई के पूर्व अध्यक्ष वीसी मिश्र का कहना है कि वकीलों के लिए उच्च व्यावसायिक मानदंड निर्धारित किए गए हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह उसका पालन करेंगे। यदि अधिवक्ता किसी एक मुकदमे में एक पक्ष की पैरवी कर रहा है तो उसी मामले में या उसी जैसे दूसरे मामलों में भी उसे दूसरे पक्ष की पैरवी नहीं करनी चाहिए। यदि उसने एक पक्ष से कोई करार किया है अर्थात स्थायी अधिवक्ता है तब भी वह दूसरे पक्ष की पैरवी नहीं कर सकता है। मगर स्वतंत्र वकील दूसरे मामलों में अन्य पक्ष की पैरवी कर सकता है। ऐसा करने पर कोई रोक नहीं है।
यूपी बार काउंसिल के पूर्व चेयरमैन वरिष्ठ अधिवक्ता वीके श्रीवास्तव के अनुसार वकील ‘इश्यू’ अलग होने पर दूसरे पक्ष का भी मुकदमा कर सकते हैं, मगर उसी विषय या संबंधित विषय में दूसरे पक्ष की पैरवी नहीं की जानी चाहिए। इसके लिए एडवोकेट्स एक्ट के सेक्शन 49(1)(सी) में प्रावधान किया गया है। इस धारा के चैप्टर दो में वकीलों के लिए प्रोफेशनल कंडक्ट तय हैं। इसके तहत उसका पहला कर्तव्य अदालत, दूसरा अपने वादकारी, तीसरा विपक्षी वादकारी और चौथा विपक्षी वकील के प्रति भी है। इसमें प्रावधान है कि वकील ने किसी एक पक्ष की ओर से केस दायर किया है तो उसे दूसरे पक्ष की पैरवी नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह जिस पक्ष का वकील बनता है, उसकी गोपनीय बातें भी जान जाता है अब उसी पक्ष के खिलाफ खड़े होने से गोपनीयता भंग होने की संभावना होती है। वकील के लिए व्यावसायिक समर्पण जरूरी है।