विधि एवं न्याय के क्षेत्र में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रयोग को सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। संविधान में राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी एवं इसकी लिपि देवनागरी को मान्यता देने के लिए प्रावधान के बाद भी संविधान में ही ऐसे अनेक प्रावधान हैं, जो हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में व्यवहार में आने में अड़चन खड़ा कर रहे हैं। इन्हीं प्रावधानों के कारण ही राष्ट्रभाषा एवं प्रादेशिक भाषाएं विधि एवं न्याय के क्षेत्र में व्यावहारिक धरातल पर स्वीकार्य नहीं हो पाई हैं। यह बातें इलाहाबाद विश्वविद्यालय एवं भारतीय भाषा अभियान की ओर से आयोजित ‘विधि एवं न्याय के क्षेत्र में भारतीय भाषाएं’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन पर मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति केएन बाजपेयी ने कही।
उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट में न्यायधीशों को अंग्रेजी अथवा प्रदेश की राजभाषा में निर्णय देने का विकल्प उपलब्ध है, परंतु न्यायधीशों की अंतर-राज्यीय स्थानांतरण व्यवस्था के चलते जब कोई न्यायाधीश देश के एक भाग में स्थित हाईकोर्ट से स्थानांतरित होकर दूसरे भाग में स्थित हाईकोर्ट में जाता है तो उसके लिए उस राज्य की राजभाषा में काम करना कठिन रहता है। इसी कारण से उसे अंग्रेजी में काम करने पर विवश होना पड़ता है।
डीन लॉ प्रो. राकेश खन्ना ने विधि के निर्माण, अध्ययन एवं अध्यापन में आने वाली भाषागत समस्याओं का विवेचन करते हुए कहा कि अधिकांश विद्यार्थी हिंदी माध्यम में पढ़ते और परीक्षाएं देते हैं, इसके बाद भी बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कुछ प्रावधानों केचलते पाठ्यक्रमों में हिंदी भाषा के माध्यम से अध्ययन, अध्यापन नहीं हो सकता है। हमारे विधि का आधार अंग्रेजी अथवा संस्कृत भाषा में उपलब्ध है, जब तक हिंदी में विधि साहित्य सामग्री उपलब्ध नहीं होगी कठिनाई बनी रहेगी।
धन्यवाद ज्ञापन में विभागाध्यक्ष प्रो. आरकेचौबे ने कहा कि विवि के स्तर से आवश्यक विधिक औपचारिकताओं केपूरा हो जाने पर विद्यार्थियों को एक अनुभाग हिंदी माध्यम से भी उपलब्ध कराया जाएगा। गोष्ठी में अतुल कोठारी, भारत के अतिरिक्त महान्यायवादी अशोक मेहता, हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष आरके ओझा, वरिष्ठ अधिवक्ता महेश चंद्र चतुर्वेदी ने विचार रखे।