जेड एंड जेड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड की ओर से शुक्रवार को प्रयाग अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का आगाज हुआ। महोत्सव के पहले दिन देश विदेश की तकरीबन 16 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ फिल्म लेखक सागर सरहदी को ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से नवाजा गया। वरिष्ठ फिल्म लेखक को कमलेश पांडेय को ‘शान-ए-प्रयाग’ और निर्माता निर्देशक एन. चंद्रा को ‘एक्सीलेंस इन सिनेमा’ और डॉ. अनीता सहगल को ‘युवा अचीवर्स अवार्ड’ सम्मान से नवाजा गया। फिल्म महोत्सव में अ डॉक्टर्स ड्रीम, थ्रस्टी क्रो, मेजबान, एबीसी, सेव द बीज, इमैजिंग बांबे, लड्डू, रेउ रॉफ्ट आदि फिल्में दिखाई गईं।
सागर सरहदी ने कहा कि मैं कहानियां लिखता हूं, दिन रात शब्दों की दुनिया में ही रहता हूं, लेकिन आज इस सम्मान का शुक्रिया अदा करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। कमलेश पांडेय ने कहा कि मुंबई में कहानियां खत्म हो चुकी हैं। वहां जिंदगी खत्म हो चुकी है, सिर्फ मशीनों की तरह लोग चल रहे हैं। अच्छा काम और कहानियां तो छोटे शहरों से आ रही हैं। एन चंद्रा ने युवाओं से फिल्म बनाने और आगे बढ़ते रहने की बात कही। फिल्म विकास परिषद के उपाध्यक्ष ने उप्र की फिल्म नीति और योजनाओं के बारे में जानकारी दी। वेबसाइट और सरकार द्वारा फिल्म बनाने के अनुदान के बारे में बताया। इस मौके पर महोत्सव निदेशक हसन हैदर ने कहा कि प्रयाग में फिल्म महोत्सव कराने का मकसद नए फिल्मकारों के लिए एक ऐसा मंच उपलब्ध कराना है, जहां वह अपनी प्रतिभा और रचना को अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुंचा सकें ।
कभी नहीं छोड़ता इलाहाबाद
इलाहाबाद को आप भले ही छोड़ देें, लेकिन शहर आपको नहीं छोड़ता। मेरा सारा बैंक बैलेंस इलाहाबाद में ही है। यहां पर हर तरह की ऊर्जा है। अल्लापुर स्थित उनके घर के आसपास के युवा और उनकी बातें, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, संगम, लोकनाथ की गलियों में जीवन से जुड़ी हर ऊर्जा है। वह जब भी कोई कहानी लिखते हैं इलाहाबाद उनके जेहन में रहता है। वरिष्ठ फिल्म लेखक कमलेश पांडेय
समाज की देन है परिवारवाद
बॉलीवुड के बारे में कहा जाता है कि यहां स्टार संस और स्टार डॉटर्स को बढ़ावा दिया जाता है, मगर यह उसी परिवार वाद की देन है जो समाज का ही हिस्सा है। सिर्फ बॉलीवुड क्या हर क्षेत्र में आज परिवार वाद है। हमें समाज को बदलने की जरूरत है। फिल्म क्षेत्र में आने वाले युवा हो या फिर किसी और क्षेत्र में उनमें संयम और तनाव को झेलने की कमी देखने को मिल रही है। निर्देशक एन. चंद्रा
हमेशा दिल में बसा रहेगा इलाहाबाद
आज अगर मैं फिल्म लेखक न तो होता तो नाटककार होता। हमारे समय में जीने के लिए दो ही विकल्प थे, दुकान खोलिए या फिर फिल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करिए। मैंने फिल्म इंडस्ट्री को चुना। क्योंकि नाटककार को किस तरह की दिक्कतों से जूझना पड़ता है यह सभी जानते हैं। इलाहाबाद आकर बहुत अच्छा लगा। यहां मुझे जो सम्मान और अपनापन मिला, वह मेरे दिल में हमेशा बसा रहेगा। वरिष्ठ फिल्म लेखक सागर सरहदी