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नहीं छूटा इलाहाबाद से नीलाभ का नाता

Sun, 24 Jul 2016 02:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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नीलाभ अश्क - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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पहले कालिया और अब हिन्दी के जानेमाने कवि-अनुवादक नीलाभ का जाना इलाहाबाद की साहित्यिक जमीन को और शून्यता दे गया। वह भले ही कई दशकों से दिल्ली का हिस्सा बन गए थे लेकिन इलाहाबाद से उनका नाता कभी नहीं छूटा। बीते डेढ़ वर्ष के दौरान वह दो बार इलाहाबाद आए। पिछली और अंतिम बार तो तकरीबन चार माह पहले आए तो बैटरी वाले ई-रिक्शे से बैठकर पूरा शहर घूमे।
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पैतृक आवास पांच, खुसरोबाग वाली एनेक्सी बेचने का उन्हें बड़ा मलाल था। उसे बेचने के बाद जब-जब इलाहाबाद आना हुआ तो ठिकाने की दरकार रही। कई बार वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ऊपरी मंजिल पर बने अतिथि गृह में ही ठहरे।

जब तक नीलाभ इलाहाबाद रहे, नीलाभ प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र रहा। अनेक साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर कई नाटकों के पाठ भी यहां हुए। काफी हाऊस में भी बेलौस अंदाज में उनके ठहाके गूंजे। अंतिम समय वह दिल्ली के राष्ट्ीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ‘रंग-प्रसंग’ के संपादन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। कविता के अतिरिक्त अनुवाद में भी वह सिद्धस्त थे। बीते दिनों उन्होंने इब्ने सफी के चुनिंदा जासूसी उपन्यासों के हिन्दी अनुवाद का संपादन किया तो अपने संपादकीय में इब्ने सफी के रचना संसार को सलीके से रेेखांकित किया।
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नीलाभ मानते थे कि पढ़ने के लिए रोचक होना जरूरी है। इसके लिए उन्होंने कोई खास खांचे नहीं बना रखे थे। कहते थे, मैं हमेेशा से ही हर तरह की चीजें पढ़ता रहा हूं। मेरे लिए साहित्यिक कृतियां तो महत्वपूर्ण हैं ही, पर जिस तरह साहित्य को ऊंची चीज समझा और उसके प्रति पवित्रता का भाव रखा जाता है, मेरे साथ वैसा नहीं है।  चालू किस्म के उपन्यास से लेकर महाकाव्य महाभारत को मैं एक जैसी शिद्दत से पढ़ता हूं। हां, इतना जरूर है कि वह किताब रोचक और पठनीय होनी चाहिए, ऊबाऊ नहीं।

दिल्ली जाने के बावजूद उनसे इलाहाबाद कभी नहीं छूटा। अंत तक उनकी इच्छा रही कि काश इलाहाबाद लौट आऊं। इसके लिए कई बार कोई मकान लेने की कोशिश भी की लेकिन बात नहीं बनी। फिर भी किसी न किसी बहाने से वह बीच-बीच में इलाहाबाद आते रहे। हिन्दी विश्वविद्यालय में ‘किताबनामा’ के तहत वरिष्ठ कवि नंदल हितैषी की पुस्तक पर चर्चा के दौरान मंच पर भले नही बैठे लेकिन अपनी बात सलीके से रखी। वह मन से कभी नहीं कमजोर रहे लेकिन शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगा था। वह युवाओं के दोस्त थे। उनकी साफगोई और लोगों के प्रति उनका जुड़ाव दोनों अद्भुत था। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। एक जिंदादिल और अपनी शर्तों पर जीने वाला इंसान चला गया। नीलाभ, बहुत आएगी तुम्हारी याद।
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