इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि अवमानना अदालत को ऐसा आदेश देने का अधिकार नहीं है, जो मूल अदालत के आदेश के अनुपालन की परिधि से बाहर का हो।
कोर्ट ने अवमानना अदालत के 18 नवंबर 2019 को पारित आदेश पर रोक लगा दी है जिसके तहत अपीलार्थी को प्रथम दृष्टया अवमानना का दोषी करार देते हुए आरोप निर्मित किए जाने के लिए हाजिर होने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने इस मामले की प्रतिपक्षी खुशबू कुमारी गुप्ता को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब मांगा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति भारती सप्रू तथा न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की खंडपीठ ने रवींद्र नायक आयुक्त ग्रामीण विकास उत्तर प्रदेश की विशेष अपील की सुनवाई करते हुए दिया है। खुशबू कुमारी ने ग्राम विकास अधिकारी की भर्ती में आवेदन दिया था। साक्षात्कार के बाद चयन परिणाम घोषित नहीं किया गया तो याचिका दाखिल की गई, जो खारिज हो गई।
विशेष अपील पर कोर्ट ने परीक्षा परिणाम घोषित करने का आदेश दिया था और कहा था याची को सूचित किया जाए। परिणाम घोषित होने के बाद नियुक्तिन होने पर अवमानना याचिका दाखिल की गई।
याची की ट्रिपल सी की डिग्री मान्य संस्था से न होने के कारण नियुक्ति नहीं हो सकी। कोर्ट ने अपीलार्थी को प्रथम दृष्टया अवमानना का दोषी करार दिया और कहा कि अवमानना का आरोप निर्मित करने के लिए हाजिर हो।
जिसे इस विशेष अपील में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि मूल आदेश की परिधि के बाहर जाकर अवमानना कोर्ट द्वारा की गई कार्रवाई को सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया दोषी करार देने एवं आरोप निर्मित करने के लिए तलब करने के आदेश पर रोक लगा दी है और कहा कि अवमानना अदालत का आदेश स्कोप से बाहर है।